“मंतर”
सर्द सी उस सुब्ह का वो मंज़र अब तक याद है
कोहरा कैसा छाया था पानी पर अब तक याद है
पीछे धुंधली रौशनी बल्बों की आगे कुछ नहीं
ऐसे में दरिया से निकला मंतर अब तक याद है
डूब जा गहरा है पानी देर मत कर डूब जा
कोशिशें तह तक पहुँचने की कर आ जा और उतर
तैरना बेकार है उस पार क्या ही पाएगा
फ़ाइदा इस मौज का इस लहर का ले डूब जा
डूब जा ठंडा है पानी ये घड़ी है डूब जा
आग तेरी और कैसे शांत होगी सोच मत
हिचकिचाहट चीज़ तेरे ध्यान के लाइक़ नहीं
राम तक डूबे हैं पानी में तुझे फिर क्या भरम
डूब जा प्यासा है पा- तब तक किनारा आ गया
नक़्द देकर ना-ख़ुदा को शुक्रिया कह कर उसे
शाल थोड़ी और कसके ओढ़कर मैं चल दिया
बात थोड़े पहले की है ये पर अब तक याद है















