ek dar mujh pe khula koshish-e-naakaam ke baad | एक दर मुझ पे खुला कोशिश-ए-नाकाम के बाद

  - Haider Khan

एक दर मुझ पे खुला कोशिश-ए-नाकाम के बाद
एक आग़ाज़-ए-सफ़र एक के अंजाम के बाद

मुझ सेे मिलना हो जिसे दिन के उजालों में मिले
ख़ुद से रहती है मुलाक़ात मिरी शाम के बाद

ज़िन्दगी जाम है इक जाम भी जो ज़हर-आलूद
और बस मौत ही अंजाम है इस जाम के बाद

हाथ ये जब भी उठाया है दुआ को मैं ने
लब पे आया ही नहीं कुछ भी तिरे नाम के बाद

एक मुद्दत से सिपर बन के जिया जिन के लिए
तेग़ सा उनको भी लगने मैं लगा काम के बाद

एक इल्ज़ाम-ए-मोहब्बत तो मिरे सर पर है
अब हिरासत भी अता हो मुझे इल्ज़ाम के बाद

नामा-बर ऐसे न कह हम को है उम्मीद बहुत
आएगा उनका जवाब आख़री पैग़ाम के बाद

  - Haider Khan

Maikada Shayari

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