ये क्या कम है ज़िंदा हम हैं
माना ख़ुशियाँ थोड़ी कम हैं
हाँ ये ज़ुल्फ़ें पेच-ओ-ख़म हैं
लब हैं हँसते आँखें नम हैं
एहसास नहीं हम
में आते
अब थोड़े से पत्थर हम हैं
ये दुनिया थोड़ी अच्छी है
लेकिन इस
में ज़्यादा ग़म हैं
लिखती रहनी ग़ज़लें सलमा
सब से अच्छी ये हम-दम हैं
— Salma Malik















