इक ज़ख़्म एक ख़्वाब अता कुछ न कर सके
वो दोस्त क्या जो अच्छा बुरा कुछ न कर सके
वो मुझ में भर गया है मोहब्बत के नाम पर
इक रंग जिस का आब-ओ-हवा कुछ न कर सके
इक ज़ेहन जिस पे तेरी तवज्जोह का बोझ है
इक सहन जिस का बाद-ए-सबा कुछ न कर सके
'ज़ोरेज़' कर रहे हैं उन्हें राएगाँ शुमार
जो लोग रौशनी के सिवा कुछ न कर सके
— Usama Zoraiz















