याद इक शख़्स की और बेरोज़गारी रही
बस यही है मियाँ दास्ताँ जो हमारी रही
अपनी ही राह को काँटों से हम सजाते रहे
इश्क़ की ये बला इस क़दर हम पे भारी रही
मुस्कुराहट सुकूँ नींद उम्मीद सब छिन गया
साथ जैसे मुहब्बत नहीं इक जुआरी रही
इश्क़ दोनों तरफ़ से अगर हम-सरी था तो फिर
क्यूँ बिछड़ते हुए आँख नम बस हमारी रही
दुख मिला तो मिला हर किसी को यहाँ चैन भी
इक हमारी ही दाइम ग़मों पे सवारी रही
— Haresh Vanza















