yaad rahe | याद रहे

  - Varsha Gorchhia

याद रहे
चाहतों का ये शहर
ख़्वाबों का मोहल्ला
इश्क़ की गली
और कच्चा मकाँ मोहब्बत का
जो हमारा है
ख़ुश्बूओं की दीवारें हैं जहाँ
एहसासात की छतें
हँसी और आँसुओं से
लिपा-पुता आँगन है
हरा-भरा
गहरी छाँव वाला
प्यार का एक पेड़ है जहाँ

क़िस्सों के चौके में
बातों के कुछ बर्तन
औंधे हैं शर्मीले से
तो कुछ सीधे मुस्कुराते हुए

शिकायतों के धुएँ से
काले कुछ बर्तन
हमारा मुँह ताकते हैं
कि क्यूँ नहीं उन्हें साफ़ किया
रगड़ कर हम ने

भीतर एक ट्रंक भी है
लम्हों से भरा
रेशमी चादरों में
यादों की सिलवटें हैं
आले में जलता चराग़
वो खूटियों पर लटकते
दो जिस्मों की झिल्लियाँ
जंगलों और खिड़कियों से
झाँकती चाहतें हमारी
दरवाज़े की चौखट से
टपकती हुई
बरसात की पागल बूँदें कुछ
हवा के कुछ झोंके

और न जाने क्या क्या
सब बिक जाएगा इक दिन
समाज के हाथों
रिवाज़ें बोलियाँ लगाएँगी
ज़ात भाव बढ़ाएगी अपना
और ख़रीद लेंगे
जनम के ज़मीन-दार
वो मकाँ हमारा

  - Varsha Gorchhia

Promise Shayari

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