“निशानी”
एक भी तुम्हारी तस्वीर पुरानी नहीं
मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
तुम ने हर बार मुझे झूठे दिलासे दिए
मैं वो सब हक़ीक़त समझता रहा
अब ये बात किसी को सुनानी नहीं
मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
अब तो तुम्हें कोई और पसंद आ गया होगा
अब तो तुम उसे ही सोचती रहती होगी
मुझे ख़बर है तुम मेरी दिवानी नहीं
मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
गर मुझे छोड़ना ही था तो मुझे ख़्वाब क्यूँ दिखाए
बुझते हुए दिए को इक उम्मीद क्यूँ दी
मैं तो अपनी सुद्द-बुद में खोया था
तुम्हें क्या ख़बर मैं तुम्हारी ख़ातिर कितना रोया था
आग दिल में जो है वो बुझानी नहीं
मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं
जाते-जाते तुम ने इक बार भी मेरी ख़बर न ली
बरसों पहले तुम ने मुझ से किनारा कर लिया
अब यादों की मय्यत उठानी नहीं
मेरे पास तुम्हारी कोई निशानी नहीं















