ये नहीं है की तू याद आया नहीं
ज़िक्र गर तेरा होंठों पे लाया नहीं
क़ोई उम्मीद थी रौशनी की नहीं
पर चराग़ों को हम ने बुझाया नहीं
ख़ुद से ज़्यादा भरोसा था तुझ पे मुझे
सो तुझे हमनें भी आज़माया नहीं
आज ज़्यादा परेशाँ रहेगी तू तो
आज मैं ने तुझे जो सताया नहीं
— Vivek Chaturvedi















