इश्क़ की राहों में गुज़र के देखते हैं
इक दफ़ा हम उनपे मर के देखते हैं
मैं बुरा हूँ और दुनिया कितनी अच्छी
ये भी तो अब हम सुधर के देखते हैं
देखा था हमनें दफ़ा इक आँख भर के
तब से उन्हें आँख भर के देखते हैं
वो बिछाती है मेरे रस्तों में पलकें
अपने रस्तों में गुज़र के देखतें हैं
— Vivek Chaturvedi















