इश्क़ कर बैठे मुझ जैसे बदनाम से
आप को डर नहीं लगता अंजाम से
उस के रुख़सार को कह दिया आम सा
रात भर मैं लड़ा कितना गुलफ़ाम से
देख सिग्रेट का पैकेट माँ ने कहा
अब हमारा भी लड़का गया काम से
जेल निर्दोष ही भेज दो मुझ को तुम
बैठ लिखता रहूँ ग़ज़लें आराम से
हाँ वो क़ातिल नहीं है मेरा पर सुनो
बच भी सकता था मैं उस के पैग़ाम से
है नहीं मेरा हो भी नहीं सकता अब
वास्ता कोई अल्लाह या राम से
— Anuj Vats















