तेरे हाथों में है क्यूँ ख़ंजर हसीना
काम हो आँखों से तो बेहतर हसीना
मेरे कहने से कहाँ होता है अब कुछ
हो वही कह दे जो भी हँस कर हसीना
हर कोई दफ़्तर के चक्कर काटता है
बन के आई गाँव में अफ़सर हसीना
क्यूँ बदलती है वो कपड़े रील्स में अब
हो गई है सच में क्या बे-घर हसीना
ये दुकान-ए-हुस्न कब तक यूँ चलेगी
मान मेरी काम भी कुछ कर हसीना
आशिक़ों का हाल भी तो देख बेरहम
मुँह दिखाना है ख़ुदा को डर हसीना
बाल बिखरे होंठ पे है ज़ख़्म गोया
सच कहो कोई तो है चक्कर हसीना
मेरी ग़ज़लों से मेरी आँखों से डरती
सामने काँपे मेरे थर थर हसीना
है शिकायत एक ही दुनिया से यारो
क्यूँ नहीं है मुझ को हासिल हर हसीना
गुल खिले रहते हैं गुलशन में हज़ारों
पर अकेली होती है अक्सर हसीना















