मैं ने पिघलती देखी, जमी थी जो क़ार है
मेरी क़लम में अब भी बहुत तेज़ धार है
तन्हाइयाँ मिली हैं मुझे इस ज़माने में
अब ज़िन्दगी भी हो गई ये ज़ार-ज़ार है
दुन्या का हाल क्या किया है देख ले ज़रा
टूटा हर एक इंसाँ है, जाँ तार-तार है
बचपन जवानी आई, बुढ़ापा भी आएगा
दुन्या में हर बशर ही क़ज़ा का शिकार है
नाराज़ हो के तुम से कहाँ जाऊँ मैं भला
उलफ़त की आँधी दिल में उठी बार-बार है
इस इश्क़ का मुझे लगा है मर्ज़ ऐसा अब
चढ़ता कभी है और उतरता बुख़ार है
तुम ही हो आरज़ू मेरी और तुम ही जान हो
इज़हार कर लिया है सनम तुम से प्यार है
— Manish Kumar Gupta














