अभी तो मरहले हैं और बाक़ी
ग़मो के हैं अभी तो दौर बाक़ी
सताना है अभी तो और तुझ को
अभी तो ज़ीस्त के हैं जौर बाक़ी
ख़बर तुझ को नहीं, तेरी हुई क्या
तुझी को कर रहे हैं ग़ौर बाक़ी
रिवाजों रस्मों में जकड़ा हुआ हूँ
बता अब कौन से हैं तौर बाक़ी
भला कैसे मिटाऊँ भूख अपनी
नहीं हैं पास मेरे कौर बाक़ी
नहीं बाक़ी बची हैं गर्म साँसे
घड़ी-भर भी नहीं है फ़ौर बाक़ी
छुपा फिरता रहा हूँ मुद्दतों से
कहाँ जाऊँ, नहीं है ठौर बाक़ी
— Manish Kumar Gupta















