तुझ सेे मेरी हर ख़ुशी है
ज़ीस्त की तू रौशनी है
तुम डराओ मत क़ज़ा से
हर तरफ़ ही ज़िन्दगी है
हो रहा है जिस्म बेजान
रूह में अफ़सुर्दगी है
है नहीं कोई किसी का
छाई मुझ
में बेख़ुदी है
वस्ल की आई है शब आज
दिल में मेरे खलबली है
क्यूँ की तुम ने बेवफ़ाई
आह इक दिल में दबी है
कुछ अलग है शौक़ मेरा
ग़ज़लों से ही बंदगी है
ख़ून से लिक्खी थी मैं ने
जो ग़ज़ल तुम ने सुनी है
मैं नशा करता नहीं हूँ
फिर भी रहती रिंदगी है
मौत के मरकज़ में था मैं
तुम मिले तो ज़िन्दगी है
कुछ सही पहले नहीं था
अब ग़लत लगता सही है
— Manish Kumar Gupta















