शहर-ए-दिल में कोई भी अपना नहीं

दर्द जिस से बाँट लूँ, मिलता नहीं

लम्हा-लम्हा तेरी यादें साथ हैं
दिल है तन्हा पर मगर इतना नहीं

हैं जहाँ पक्के मकाँ तू वाँ बरस
इस नगर में घर कोई पक्का नहीं

उम्र तन्हाई में मैं ने काट दी
पास कोई भी मेरे आता नहीं

मुफ़्लिसी ने कर दिया इनको बड़ा
दिल किसी का अब यहाँ बच्चा नहीं

रूह सबकी यास है, आँखें हैं नम
अब बशर सपने नए बुनता नहीं

दे पता दरिया का मुझ को नाख़ुदा
डूबने को दरिया भी मिलता नहीं

— Manish Kumar Gupta

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