फ़ज़ा-ए-क़र्या तिलिस्म-ए-सुकूत में गुम-सुम
सियाह रात के दामन में बाम-ओ-दर ख़ामोश
हमारे बा'द अगर रुस्तख़ेज़ हो भी तो क्या
बिसात-ए-वक़्त से हम तो गए गुज़र ख़ामोश
ब-ईं नवाज़िश-ए-मौसम शगुफ़्त-ए-गुल पे न जा
ज़बान-ए-हाल से गोया ब-चश्म-ए-तर ख़ामोश
जो अर्श-ए-जाह सितारा-शिकार थे उन को
फ़लक की आँख ने देखा फ़गंदा-सर ख़ामोश
हर एक दौर में गूँजी है ज़रबत-ए-फ़रहाद
कभी भी रह न सके साहब-ए-हुनर ख़ामोश
ज़बाँ-दराज़ 'ज़ियाई' को रोकिए साहब
ये मस्लहत का तक़ाज़ा है अल-हज़र ख़ामोश
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वो कम-नसीब जो अहद-ए-जफ़ा में रहते हैं
अजीब मअरिज़-ए-कर्ब-ओ-बला में रहते हैं
अजीब मअरिज़-ए-कर्ब-ओ-बला में रहते हैं
नुमूद-ए-ज़ौक़ ओ बुलूग़-ए-हुनर का ज़िक्र ही क्या
यहाँ ये लोग तो आह-ओ-बुका में रहते हैं
विदा-ए-ख़ुल्द के ब'अद अर्सा-ए-फ़िराक़ में हैं
ब-क़ैद-ए-जिस्म दयार-ए-फ़ना में रहते हैं
वो सुब्ह ओ शाम मिरी रूह में हैं जल्वा-नुमा
दिल-ए-फ़िगार ओ अलम-आश्ना में रहते हैं
हिसार-ए-ज़ात में महबूस हो के अहल-ए-हवस
फ़रेब-ए-हासिल-ए-बे-मुद्दआ में रहते हैं
भुला चुके हैं ज़मीन ओ ज़माँ के सब क़िस्से
सुख़न-तराज़ हैं लेकिन ख़ला में रहते हैं
अमीर-ए-शहर की सोहबत के फ़ैज़ से 'अख़्तर'
जनाब-ए-शैख़ अब ऊँची हवा में रहते हैं
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मैं जानता हूँ बदलती रुतों की ख़ुश्बू से
हवा-ए-दश्त तिरा इम्तिज़ाज बदलेगा
जुमूद-ए-मर्ग नुमूद अस्ल ज़िंदगी है तो फिर
जो कल न बदला यक़ीनन वो आज बदलेगा
ख़ुलूस-ओ-मेहर-ओ-वफ़ा ख़्वाब हो गए जैसे
न जाने कब ये नहूसत का राज बदलेगा
नए शुऊ'र के चर्चे हैं चार सू 'अख़्तर'
मुझे यक़ीं है ये कोहना समाज बदलेगा
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छोड़िए उन के शब-ओ-रोज़ की रूदाद-ए-ज़ुबूँ
आप को ख़ाक-नशीनों से सरोकार भी है
मस्लहत मुझ को भी मलहूज़ है ऐ हम-सुख़नो
पर मिरे पेश-ए-नज़र वक़्त की रफ़्तार भी है
मौत के ख़ौफ़ से हर साँस रुकी जाती है
ज़िंदगी आज कोई तेरा ख़रीदार भी है
तल्ख़ी-ए-हाल को है इशरत-ए-फ़र्दा का फ़रेब
दिल जुनूँ-कोश है और अक़्ल तरहदार भी है
मेरे महबूब मुझे वक़्फ़-ए-तग़ाफ़ुल न समझ
ज़ीस्त के लाख तक़ाज़े हैं तेरा प्यार भी है
अहल-ए-गुफ़्तार की तो भीड़ लगी है 'अख़्तर'
देखना इन में कोई साहब-ए-किरदार भी है
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यूँ उभरती है दिल-ए-तार में उम्मीद की ज़ौ
जैसे ज़िंदाँ के कभी रौज़न-ओ-दर खुलते हैं
ग़म से मिलता है मिरी फ़िक्र को इस तरह फ़राग़
जिस तरह ताइर-ए-पर-बस्ता के पर खुलते हैं
अब्र बरसे तो बयाबाँ में महकती है बहार
लाख मय-ख़ाने सर-ए-राहगुज़र खुलते हैं
जिन को अफ़्ज़ाइश-ए-मंतिक़ ने किया हो तख़्लीक़
ऐसे उक़दे भी कहीं अहल-ए-नज़र खुलते हैं
शैख़ जी अर्सा-ए-जलवत में हैं पाबंद-ए-रुसूम
पर ये ख़ल्वत में बहुत शो'बदा-गर खुलते हैं
फ़हम-ओ-इबलाग़ कोई खेल नहीं है 'अख़्तर'
ख़ून-ए-दिल देने से असरार-ए-हुनर खुलते हैं
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ता उम्र इंतिज़ार सही पर ब-रोज़-ए-हश्र
अच्छा हुआ कि तेरे तलबगार हम हुए
हम पर वफ़ा-ए-अहद अनल-हक़ भी फ़र्ज़ था
इस वास्ते कि महरम-ए-असरार हम हुए
ठहरेगी एक दिन वही मेराज-ए-बंदगी
जो बात कह के आज गुनहगार हम हुए
होते गए वो ख़ल्क़-फ़रेबी में होशियार
जितना कि तजरिबे से समझदार हम हुए
नादान थे कि मसनद-ए-इरशाद छोड़ कर
हल्क़ा-ब-गोश-ए-सीरत-ओ-किरदार हम हुए
इस दौर-ए-ख़ुद-फ़रोश में 'अख़्तर' ब-सद ख़ुलूस
ख़म्याज़ा-संज-ए-जुरअत-ए-इज़हार हम हुए
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उदास फिरती है शादाब वादियों की महक
है काएनात यही कुंज-ए-आशियाना मुझे
अदू की संग-ज़नी की नहीं मुझे परवा
तिरे करम का मुयस्सर है शामियाना मुझे
कोई इलाज-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी बता वाइज़
सुने हुए जो फ़साने हैं फिर सुना न मुझे
सुबुक-सरी में ज़मीन-ए-वतन भी तंग हुई
कशाँ कशाँ लिए फिरता है आब-ओ-दाना मुझे
मिरे नसीब में है किश्त-ए-जाँ की वीरानी
न आई रास रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ाना मुझे
भटक रहा हूँ उसी की तलाश में 'अख़्तर'
कि जिस दयार को छोड़े हुआ ज़माना मुझे
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तज्ज़िया दिल-नशीं ख़यालों का
है ग़ज़ालों की जुस्तुजू करना
तज़्किरा इन की दिल-नवाज़ी का
और फिर मेरे रू-ब-रू करना
बस यही एक शग़्ल-ए-तन्हाई
रह गया ख़ुद से गुफ़्तुगू करना
कुश्तगान-ए-अलम से सीखा है
दर्द-मंदों की आबरू करना
दोस्तों के करम से छोड़ दिया
हम ने अंदेशा-ए-अदू करना
बचना हर नोक-ए-ख़ार से 'अख़्तर'
ज़ख़्म फूलों के भी रफ़ू करना
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जाँ रहे या न रहे नाम रहे
साथियो रस्म-ए-जुनूँ आम रहे
साथियो रस्म-ए-जुनूँ आम रहे
बारहा सई-ए-तलब की हम ने
ये अलग बात कि नाकाम रहे
अज़्मत-ए-इश्क़ से ना-वाक़िफ़ थे
जो असीर-ए-हवस-ए-ख़ाम रहे
क्या तअ'ज्जुब है कि पीरान-ए-हरम
मर के भी तालिब-ए-असनाम रहे
क्या ख़बर है कि यूँ ही ऐ 'अख़्तर'
ता-ब-कै गर्दिश-ए-अय्याम रहे
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हिद्दत-ए-शौक़ सलामत है तो ज़ंजीर-ए-जफ़ा
सूरत-ए-शम्अ' किसी रोज़ पिघल जाएगी
उन का दम भरते हो तो ग़म न करो आख़िर-कार
उन पे दम देने की हसरत भी निकल जाएगी
हम-सफ़ीरो कभी मिटती है तमन्ना-ए-बहार
ये किसी फूल किसी शो'ले में ढल जाएगी
यही बेहतर है कि क़ुर्बान-ए-वफ़ा हो जाए
जाँ अगर आज न जाएगी तो कल जाएगी
किस को मालूम था मल्बूस-ए-सबा में सरसर
आ के गुलशन में शगूफ़ों को मसल जाएगी
अब के सावन भी अगर अब्र न बरसा 'अख़्तर'
जो कली शाख़ पे निकलेगी वो जल जाएगी
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