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backEhtisham ul Haq Siddiqui

Top 10 of Ehtisham ul Haq Siddiqui

Ehtisham ul Haq Siddiqui

Top 10 of Ehtisham ul Haq Siddiqui

    अपने शब-यारों से किस तरह मैं ग़ाफ़िल हो जाऊँ
    आसमाँ जाग रहा है तो मैं कैसे सो जाऊँ

    दिल-ब-दर मैं भी हूँ और तू भी है मा'ज़ूल-नज़र
    तू इजाज़त दे अगर मुझ को मैं तेरा हो जाऊँ

    वक़्त ने इतने बदलवाए हैं चेहरे मुझ से
    ख़ौफ़ है भीड़ में इन की न किसी दिन खो जाऊँ

    जहल की बाँझ ज़मीनों में न अग पाऊँगा
    इल्म-परवर हो ज़मीं कोई तो ख़ुद को बो जाऊँ

    अब्र-ए-ग़म दिल का बरस जाए तो इस पानी से
    दाग़ धब्बे हैं जो आँखों में उन्हें भी धो जाऊँ
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    और अब अक़्ल का बार नहीं गर सह सकते हो
    दिल के इस पागल-ख़ाने में रह सकते हो

    मेरे दिल में रहना रास नहीं आया तो
    बे-शक आँख से आँसू बन कर बह सकते हो

    तुम सर-ता-पा आग हो मैं हूँ टोटल पानी
    साफ़ है मेरे साथ नहीं तुम रह सकते हो

    पत्थर-वत्थर ज़ालिम-वालिम बेहिस-वेहस
    मुझ को जो भी कहना चाहो कह सकते हो

    मिट्टी होता तो पी जाता पर शीशा हूँ
    मेरे ऊपर बे-फ़िक्री से बह सकते हो
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    किस ने की बात अभी कौन शनासा निकला
    याद आया तो मिरा अपना ही चेहरा निकला

    गर्मी-ए-ज़ीस्त नहीं आज मुक़द्दर में मिरे
    आज सूरज भी जो निकला तो अधूरा निकला

    लौट जाने में लगेंगे मुझे बरसों शायद
    ये समुंदर तो मिरी सोच से गहरा निकला

    जिस्म तो ले गया वो रात में चोरी कर के
    सुब्ह बिस्तर से मिरे जिस्म का ख़ाका निकला

    ज़हमत-ए-नुत्क़ से यूँँ बच गए दोनों आख़िर
    मैं ही गूँगा न था वो शख़्स भी बहरा निकला
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    सौ तक गिनती बीस पहाड़े काम आए
    सारी दौलत में ये सिक्के काम आए

    इतने चेहरे जेब में रखे फिरते थे
    वक़्त पड़े पर कितने चेहरे काम आए

    तेरी अय्याशी थी मेरी मजबूरी
    तू ने कपड़े फेंके मेरे काम आए

    जिन को छत पर डाल दिया था गर्मी में
    सर्दी में वो धूप के टुकड़े काम आए

    आँखों ने ही इस को पाला पोसा है
    शर्म के कब ये चिलमन पर्दे काम आए

    छालों के पानी से आख़िर प्यास बुझी
    जंगल में जंगल के तोहफ़े काम आए
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    कोई ताज़ा हो कि हो कोई पुरानी चाहिए
    वक़्त को आगे बढ़ाना है कहानी चाहिए

    तू मिरी दहलीज़ पर आ कर ठहर जाता है क्यूँ
    तू तो दरिया है तुझे तो बस रवानी चाहिए

    हाथ में जिस के भी देखो आग का कश्कोल है
    और हर इक कश्कोल को कुछ बूँद पानी चाहिए

    ज़िंदगी और मौत दोनों में है इक रंग-ए-करम
    तुम बताओ तुम को किस की मेहरबानी चाहिए

    दिल से मतलब है तिरे पैकर से मुझ को क्या ग़रज़
    हुक्मरानी को मुझे इक राजधानी चाहिए
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    नसीब अब के ख़ुशी बे-हिसाब ले आया
    चराग़ लेने गया आफ़्ताब ले आया

    अभी जला के उठा हूँ पुराने ख़्वाबों को
    वो मेरे वास्ते फिर ताज़ा ख़्वाब ले आया

    फिर आज भाव समुंदर का आसमान पे था
    फिर आज अपने लिए मैं सराब ले आया

    फ़सुर्दा देख के उस को बहुत पशेमाँ हूँ
    मैं रेगज़ार में क्यूँ इक गुलाब ले आया

    तुझे तो हाँ या नहीं में जवाब देना था
    जवाब में तू मुकम्मल किताब ले आया

    अभी चला ही था दिल इक गुनाह करने को
    कि ज़ेहन जा के ख़याल-ए-अज़ाब ले आया
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    वो जो रो रहा था वो हँस पड़ा वो जो हँस रहा था वो रो दिया
    यहाँ इक जज़ीरा बना दिया वहाँ इक जज़ीरा डुबो दिया

    ये बनाने वाले का शौक़ है कहीं हार है कहीं तौक़ है
    कहीं वाह है कहीं आह है कहीं पा लिया कहीं खो दिया

    वो असीर-ए-हुस्न-ए-बयान हूँ मैं ज़बान का वो किसान हूँ
    कि ज़मीन मुझ को जहाँ दिखी वहीं इक ख़याल को बो दिया

    वो जहान-ए-हस्त के मोतियों को पिरो रहा था कमाल में
    मैं भी सामने था पड़ा हुआ तो मुझे भी उस ने पिरो दिया

    न तिलिस्म है न ये सहर है ये कमाल-ए-कूज़ा-ए-शेर है
    कि उसी से बहर रवाँ किया और उसी में बहर समो दिया
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    तिरे बदन की नज़ाकतों का हुआ है जब हम-रिकाब मौसम
    नज़र नज़र में खिला गया है शरारतों के गुलाब मौसम

    हम अपने गुम-गश्ता वलवलों पर ख़ुनुक हवाओं के क़हक़हों का
    जवाब देते जो साथ लाता हमारा अहद-ए-शबाब मौसम

    वो एक बंजर ज़मीन घर की जो सुन रही थी सभी के ताने
    ख़ुशा कि इस बार इस ज़मीं को भी दे गया इक गुलाब मौसम

    अमीर लोगों की कोठियों तक तिरे ग़ज़ब की पहुँच कहाँ है
    फ़क़त ग़रीबों के झोंपड़ों तक है तेरा दस्त-ए-इताब मौसम

    ये बर्फ़ पिघलेगी चोटियों से परों में आएगी फिर हरारत
    भरेंगे ऊँची उड़ान फिर हम रहेगा कब तक ख़राब मौसम
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    शुक्रिया बीच सफ़र आप ने तन्हा छोड़ा
    इस तरह आप ने मुझ से मिरा रिश्ता जोड़ा

    शिद्दत-ए-तैश से काँप उट्ठी हैं सारी शाख़ें
    जब भी गुलचीं ने किसी शाख़ से गुल को तोड़ा

    अपने अंदर से वो इक दम न निकालेगा मुझे
    मुझ को आँखों से वो टपकाएगा थोड़ा थोड़ा

    हम ने तहज़ीब से मयख़ाने का बदला है निज़ाम
    हम ने मय फेंकी न मयख़ाने में साग़र तोड़ा

    दोनों ख़ुश हैं तो अब इस बात का क्या ज़िक्र करें
    किस ने रुख़ अपना दर-ए-यार से पहले मोड़ा
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    Ehtisham ul Haq Siddiqui
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    ये दुनिया है यहाँ असली कहानी पुश्त पर रखना
    लबों पर प्यास रखना और पानी पुश्त पर रखना

    तमन्नाओं के अंधे शहर में जब माँगने निकलो
    तो चादर सब्र की सदियों पुरानी पुश्त पर रखना

    मैं इक मज़दूर हूँ रोटी की ख़ातिर बोझ उठाता हूँ
    मिरी क़िस्मत है बार-ए-हुक्मरानी पुश्त पर रखना

    तुझे भी इस कहानी में कहीं खोना है शहज़ादे
    ख़ुदा हाफ़िज़ ये मोहर-ए-ख़ानदानी पुश्त पर रखना

    हमेशा वक़्त का दरिया इसे रफ़्तार बख़्शेगा
    जिसे आता हो दरिया की रवानी पुश्त पर रखना
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    Ehtisham ul Haq Siddiqui
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