Faisal Azeem

Top 10 of Faisal Azeem

    ख़ुशी
    अदम के किसी झरोके
    की ओट से झाँकती नज़र का फ़रेब कोई
    तवील बे-रहम रास्तों पर सराब कोई
    तमाम शब जुगनुओं को चुनने का ख़्वाब कोई

    ख़ुशी
    वो रह रह के चंद लम्हों को साँस लेता हबाब कोई
    उदास तारों को छेड़ती उँगलियों के ज़ख़्मों स उठते सर के ख़याल में गुम रबाब कोई

    ख़ुशी
    कि मीज़ान के जज़ीरों से दूर इक बे-निशान साहिल
    ज़माने भर की ख़लीज हाइल
    उभरती मौजों में
    ग़र्क़ होने की दास्तानों की झिलमिलाहट
    जो छूना चाहो
    तो दस्तरस में
    कोई जज़ीरा न कोई साहिल

    ये ख़ाक और आब का तवाज़ुन
    ये बंद मुट्ठी से ज़र्रा ज़र्रा फिसलती मिट्टी
    नज़र में कोलाज़ इक मुजर्रद
    इधर गुमाँ की मुंडेर पर कुछ निशान
    अन्क़ा के बैठने का फ़रेब जैसे
    तू उस किनारे तराज़ू था
    में
    मुजस्स
    में की सफ़ेद आँखों पे मा'नविय्यत की काली पट्टी
    वही सियाही
    अँधेरे का है जो पेश-ख़ेमा
    वो संग आँखें
    कि जिन में पुतली कभी नहीं थी
    वो जिन की तह में
    किसी किरन का गुज़र नहीं है
    ख़ुशी है क्या मुंसिफ़ी है क्या
    कुछ ख़बर नहीं है
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    Faisal Azeem
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    ख़्वाब है या कोई तसव्वुर है
    ये तवाज़ुन ये फ़िक्र का मीज़ान
    इतना गहरा ख़मोश आवाज़ा
    हर तहर्रुक ब-क़द्र-ए-अंदाज़ा
    बे-हिसारी का ये मा'दूम हिसार
    काएनातों का बे-शुमार शुमार
    क़ुल्ज़ुम-ए-बे-कनार का आलम
    आलमों के ग़ुबार का आलम
    कहकशाओं के हार ला-महदूद
    मेहर-ए-बे-इख़्तियार ला-महदूद
    बेहद-ओ-बे-हिसाब सय्यारे
    दाग़ बे-दाग़ बे-पनह तारे
    ऐसा बे-अंत है ख़ला क्यूँकर
    ये ख़ुदा गर है ये ख़ुदा है गर
    इस हक़ीक़त की क्या हक़ीक़त है
    जुज़ तसव्वुर कहाँ ये वुसअ'त है
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    Faisal Azeem
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    रस्सी का पुल
    देखा भाला
    हचकोले मानूस
    गिर्हें जिस की उक़्दों से पुर
    तूल सफ़र इक उम्र

    रस्सी का पुल इक दिन टूटा
    और मुसाफ़िर गिरते गिरते
    उस के दोनों टुकड़े था
    में
    ख़ुद पुल बन कर बीच में लटका झूल रहा था
    सैकड़ों आँखों के झुरमुट में
    वो मस्लूब तमाशा बन कर
    टूटे पुल को जोड़ रहा था
    ऊँचाई पर दोनों सिरों की जानिब बे-रहमी से खिंचती
    ज़िद्दी रस्सी
    तुंद हवा की पैहम आड़ी तिरछी कीलें
    गहराई में बहता पानी और चट्टानें
    और हवा में दो बाज़ू शल
    इस मुट्ठी से उस मुट्ठी तक हश्र बपा था
    पानी और हवा के शोर में शिरयानों का ख़ून हो जैसे
    और तनाव चीख़ रहा हो
    अपनी आँखें खोल के देखो
    रस्सी बन गए हाथ तुम्हारे
    तुम ख़ुद अपना कफ़्फ़ारा हो
    हीले लो याह, हीले लो याह
    अब जी उट्ठो जश्न मनाओ
    लम्बे सफ़र से तुम को आज नजात मिली है
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    Faisal Azeem
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    वो शीशे का बल्ब और कोई उस के अंदर
    बहुत हाँफता गोल दीवारों को
    जल्दी जल्दी खुरचता
    फिसलता है गिरता है उठता है फ़ौरन
    मुसलसल खुरचते ही जाता है लेकिन
    उसे डर है सर पर
    लटकता हुआ धाती लच्छा कहीं जल उठा तो
    उसे भून देगा
    मगर इतनी वहशत में उस को ख़बर क्या
    कि लच्छा सलामत
    न अब बर्क़ी-रौ उस के तारों में बाक़ी
    दीवारें खुरचते खुरचते उसे शीशे के क़ैद-ख़ाने
    में बे-जान लच्छे से डरना नहीं है
    अब उस बल्ब के तार में बर्क़ी-रौ ही नहीं है
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    Faisal Azeem
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    इक रोज़ अपने आप को मैं ने
    ख़ला की वुसअ'तों से झाँक कर देखा
    तो वहशत में पलट आया
    कहीं पर दूर इक नुक़्ता सा रौशन था
    और उस नुक़्ते में इक ज़र्रा नज़र आया
    ज़मीं कहिए ज़माँ कहिए कि अपना आसमाँ कहिए
    सभी कुछ इस में गुम पाया
    वही ज़र्रा
    कि जिस की वुसअ'तों को बाँट कर हम ने
    कई ख़ित्ते बना डाले
    और उन ख़ित्तों में हम ने सरहदें भी ख़ूब खींची हैं
    सो इक सरहद के अंदर भी कई टुकड़े नज़र आए
    कि जिन टुकड़ों के टुकड़ों में कहीं इक शहर बस्ता है
    कि जिस के एक टुकड़े में पुराना इक मोहल्ला है
    सो उस के एक हिस्से में कोई छोटा सा घर होगा
    और उस घर के किसी कमरे के कोने में
    कोई अपनी हक़ीक़त लिख रहा होगा
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    Faisal Azeem
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    तिरी तल्ख़ी को चखूँ या तिरे हुस्न-ए-मआ'नी को
    किताब-ए-ज़िंदगी किस ने लिखा मेरी कहानी को

    तो सर-ता-पा कोई फ़ित्ना भी है शहकार-ए-फ़ितरत भी
    मगर मैं ज़िंदगी के नाम कर आया जवानी को

    ये किरनें फूटती हैं जो तिरे चाक-ए-गरेबाँ से
    उन्हीं के नूर से लिक्खा गया मेरी कहानी को

    ये कब जाना किसी ने ऐ मुजस्सम राज़ तू क्या है
    कि फ़ितरत ने कोई मरमर तराशा गुल-फ़िशानी को

    कहीं ज़ख़्मी सदाएँ हैं कहीं नग़्में मोहब्बत के
    तू किस की सम्त मोड़ा जाए अब के ज़िंदगानी को
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    Faisal Azeem
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    इक हाथ पे आँखें रक्खी हैं इक हाथ पे चेहरा होता है
    हर गाम मदारी बैठे हैं हर वक़्त तमाशा होता है

    अब कौन यहाँ मज्ज़ूब नहीं बाज़ार में क्या मौजूद नहीं
    इरफ़ान की माला बिकती है इल्हाम का सौदा होता है

    अपनी ख़ल्वत में ध्यान कहाँ ख़ामोशी है विज्दान कहाँ
    इक आँधी ख़ाक उड़ाती है इक आग का दरिया होता है

    दिल बहर समान आँखें रौशन पर राह-गुज़र भी तो देखो
    इक तंग-नज़र की बदली ने अंधेर मचाया होता है

    कल झूम के बोली केंचुलि-ए-इल्हाद अक़ीदे के मन से
    रिंद तुझे दो मूँहों ने क्या जाम पिलाया होता है

    हर बुत के आगे सज्दे पर ज़िंदीक़ी को मजबूर न कर
    ये जेहल-ए-मरातिब आख़िर किस काफ़िर को गवारा होता है

    हम लोग पशेमाँ फ़ितरत हैं दीवानों की कब सुनते हैं
    आँखों वाले पढ़ सकते हैं दीवार पे लिक्खा होता है
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    Faisal Azeem
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    जिसे कल रात भर पूजा गया था
    वो बुत क्यूँ सुब्ह को टूटा हुआ था

    अगर सच की हक़ीक़त अब खुली है
    तो जो अब तक नज़र आया था क्या था

    अगर ये तल्ख़ियों की इब्तिदा है
    तो अब तक कौन सा अमृत पिया था

    खुला है मुझ पे अब दुनिया का मतलब
    मगर ये राज़ पहले भी खुला था

    मैं जिस में हूँ ये दुनिया मुख़्तलिफ़ है
    जहाँ मैं था वो आलम दूसरा था

    मैं ख़ुद को मार कर पहुँचा यहाँ तक
    तो याद आया कि मैं तो मर चुका था

    मिरी मैं और तिरी मैं दोनों हारीं
    मैं बंदा हूँ मगर तू तो ख़ुदा था

    मैं अब जो मुँह छुपाए फिर रहा हूँ
    तो क्या मैं वाक़ई चेहरा-नुमा था
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    Faisal Azeem
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    भरी है आग जेबों में कफ़-ए-अफ़्सोस मलते हैं
    हमारी ही कमाई से हमारे हाथ जलते हैं

    मिरे अतराफ़ में ये खींचा-तानी कम नहीं होती
    इधर पहलू बदलता हूँ उधर जाले बदलते हैं

    किसी को भी वो अंगारा दिखाई ही नहीं देता
    इशारे से बताता हूँ तो अपने हाथ जलते हैं

    मैं अपने जिस्म से बाहर हूँ या रूहों का मस्कन है
    उन्हें मैं छू नहीं पाता जो मेरे साथ चलते हैं

    हमारे चाक पर उक़्बा कई शक्लें बदलती है
    ये जन्नत और जहन्नुम तो हमारे साथ चलते हैं

    नज़र-अंदाज़ कर के सब गुज़र जाते हैं मुझ में से
    नफ़ी करते हुए मुझ में कई रस्ते निकलते हैं

    सदा बन कर बहुत टकराए हैं मीनार-ओ-गुम्बद से
    अब आँखें खुल गई हैं तो अँधेरे से निकलते हैं
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    Faisal Azeem
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    गो तार-ए-अंकबूत आया नहीं अब तक गुमानों में
    मगर कुछ मकड़ियों की सरसराहट सी है कानों में

    ज़मीं-ज़ादों को अब मिट्टी से तो वाबस्ता रहने दो
    ख़ुदारा फ़स्ल-ए-नौ का ज़ौक़ रहने दो किसानों में

    सरों से आसमाँ भी क्या हटाया जाने वाला है
    शबीहें मेहर-ओ-मह की टाँकते हो क्यूँ मकानों में

    ज़रा ठहरो उगेगी भूक भी काग़ज़ के पेड़ों पर
    अभी तो हाथ बाँटे जा रहे हैं बाग़बानों में

    बहुत मुमकिन है पत्थर के ज़माने के नज़र आओ
    अगर पैदा किया जाए तुम्हें पिछले ज़मानों में

    न पंजे हैं न पर हैं और न है परवाज़ की ताक़त
    जो नग़्मा-संज होना हो तो लुक्नत है ज़बानों में

    चला आता है बस्ती में लिए ज़म्बील फ़तवों की
    तू ऐसा कर बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
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    Faisal Azeem
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