वो शीशे का बल्ब और कोई उस के अंदर

बहुत हाँफता गोल दीवारों को
जल्दी जल्दी खुरचता
फिसलता है गिरता है उठता है फ़ौरन
मुसलसल खुरचते ही जाता है लेकिन
उसे डर है सर पर
लटकता हुआ धाती लच्छा कहीं जल उठा तो
उसे भून देगा
मगर इतनी वहशत में उस को ख़बर क्या
कि लच्छा सलामत
न अब बर्क़ी-रौ उस के तारों में बाक़ी
दीवारें खुरचते खुरचते उसे शीशे के क़ैद-ख़ाने
में बे-जान लच्छे से डरना नहीं है
अब उस बल्ब के तार में बर्क़ी-रौ ही नहीं है

— Faisal Azeem

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