वैसे तो कम ही मियाँ अहल-ए-जुनूँ रोते हैं
देखने वाले समझते हैं कि ख़ूँ रोते हैं
देखने वाले समझते हैं कि ख़ूँ रोते हैं
पूछने वाले ब-ज़िद हैं कि बताया जाए
रोने वालों को नहीं याद कि क्यूँ रोते हैं
मुझ से मत पूछ कि तफ़रीक़ नहीं कर सकता
मैं तो हँसते हुए लोगों को कहूँ रोते हैं
वो बहुत ख़ुश है नया घर है नया शहर मगर
गाँव में उस की हवेली के सुतूँ रोते हैं
तुम को हम जैसे मगर ख़ुश ही नज़र आएँगे
ये जो हम जैसे हैं आँखों के दरूँ रोते हैं
उस की आँखों को कहाँ आता था रोना 'साहिर'
मैं ने फिर रो के दिखाया था कि यूँ रोते हैं
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आसमाँ खींच के धरती से मिला सकता है
मेरी जानिब वो कभी हाथ बढ़ा सकता है
मेरी जानिब वो कभी हाथ बढ़ा सकता है
शाह-ज़ादी जो कबूतर है तिरे हाथों में
दो क़बीलों को तसादुम से बचा सकता है
अपने काँधों से उतारा ही नहीं ज़ाद-ए-सफ़र
फिर से हिजरत का मुझे हुक्म भी आ सकता है
चाहता है जो मोहब्बत में तरामीम नई
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिला सकता है
बंद कमरे में है तन्हाई कहाँ तक मेरी
खिड़कियाँ खोल के देखा भी तो जा सकता
कोई कितना भी हो कम-ज़र्फ़-ओ-गुनहगार मगर
एक प्यासे को वो पानी तो पिला सकता है
इस लिए बा'द में उट्ठा हूँ मैं सब से 'साहिर'
वो इशारे से मुझे पास बुला सकता है
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रंग से रंग मिलाता हुआ जाता हुआ तू
कहकशाँ एक बनाता हुआ जाता हुआ तू
कहकशाँ एक बनाता हुआ जाता हुआ तू
दूर से तेरी तरफ़ भाग के आता हुआ मैं
दूर से हाथ हिलाता हुआ जाता हुआ तू
आगे आगे मैं ख़द-ओ-ख़ाल बनाता जाऊँ
पीछे पीछे वो मिटाता हुआ जाता हुआ तू
सोने वालों को नए ख़्वाब मुहय्या कर के
सब्ज़ क़िंदील जलाता हुआ जाता हुआ तू
पाँव पड़ता हुआ रोता हुआ गिरता हुआ मैं
और मिरा हाथ छुड़ाता हुआ जाता हुआ तू
मेरी ख़्वाहिश थी कि बर्बाद करूँ मैं ख़ुद को
मेरी ख़्वाहिश का बताता हुआ जाता हुआ तू
सख़्त मायूस पशेमान गुज़रता हुआ मैं
मुस्कुराता हुआ गाता हुआ जाता हुआ तू
जितनी आँखें हैं वो हैरान हुई जाती हैं
और मिरे शे'र सुनाता हुआ जाता हुआ तू
जैसे नाकाम कोई शख़्स हो वैसे 'साहिर'
एक सिगरेट को जलाता हुआ जाता हुआ तू
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लम्हों में एक उम्र की मेहनत ख़राब की
इस धूप ने मकान की रंगत ख़राब की
इस धूप ने मकान की रंगत ख़राब की
रस्ते में फूल देख के हम लोग डर गए
किस ने हमारे पाँव की आदत ख़राब की
उजलत-पसंद हाथ में आए हुए थे हम
कुछ गाहकों ने पूछ के क़ीमत ख़राब की
या'नी मैं उस के बा'द भी ख़ुश हूँ ये सोच कर
कमरे की जान-बूझ के हालत ख़राब की
वैसे ये इश्क़ कौन सा लिक्खा था बख़्त में
हम ने तो अपनी आप ही क़िस्मत ख़राब की
किस ने हमारे नाम पे बेचे हैं क़हक़हे
किस ने हमारे नाम की शोहरत ख़राब की
तंग आ के आसमाँ से निकाला गया हमें
थोड़ी बहुत जो थी यहाँ वक़अत ख़राब की
'साहिर' जुनून-ए-शौक़ में क्या क्या नहीं किया
मिट्टी पलीद की कभी इज़्ज़त ख़राब की
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वक़्त के साथ नई सोच में ढल जाते हैं
हम वो सिक्के हैं जो हर दौर में चल जाते हैं
हम वो सिक्के हैं जो हर दौर में चल जाते हैं
इतने मानूस हुए मुझ से मिरे घर के चराग़
शाम होते ही मुझे देख के जल जाते हैं
देख लेता हूँ जो कुछ देर तिरी आँखों को
तेरी आँखों से मिरे ख़्वाब बदल जाते हैं
इक तकल्लुफ़ में लिहाफ़ों का सहारा ले कर
आस्तीनों में छुपे साँप भी पल जाते हैं
वक़्त कब हाथ से जाता है किसी के 'साहिर'
वक़्त के हाथ से हम लोग निकल जाते हैं
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मैं तही-दस्त मोहब्बत में भला क्या देता
तेरे हिस्से से मगर तुझ को ज़ियादा देता
तेरे हिस्से से मगर तुझ को ज़ियादा देता
ज़िंदगी तू ने बड़ी देर लगा दी वर्ना
मैं तुझे मिलता तिरे गाल पे बोसा देता
बाज़ औक़ात अगर शे'र न होता मुझ से
उस की आँखों का इशारा मुझे मिस्रा देता
मैं ज़माने को बनाता तो ज़माने भर को
तेरी आँखें तिरा चेहरा तिरा लहजा देता
तू ठहरता तो कोई हल भी निकल सकता था
साथ चलता न तिरे मशवरा अच्छा देता
तुम को लालच थी ख़ज़ाने की सो नाकाम हुए
मुझ से कहते तो मैं उस ग़ार का नक़्शा देता
इतना ख़ुश था वो बिछड़ते हुए मुझ से वर्ना
पाँव पड़ता मैं उसे रोकता समझा देता
पीठ पीछे से अगर वार न करता 'साहिर'
अपने दुश्मन के जनाज़े को मैं कंधा देता
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हम ऐसे लोग कहाँ मंज़िलों को पाते हैं
हम ऐसे लोग फ़क़त रास्ते बनाते हैं
हम ऐसे लोग फ़क़त रास्ते बनाते हैं
ये तेरे जिस्म को छू कर पता चला है मुझे
कि नर्म फूल बहुत जल्द सूख जाते हैं
ये काम हिज्र में बिदअ'त शुमार होता है
मगर ये देख कि हम फिर भी मुस्कुराते हैं
तिरा तो ख़ैर कोई तुझ से दूर ही न गया
तुझे ख़बर ही नहीं साँस कैसे आते हैं
नज़र न आएँगे तुझ को ग़ुबार उड़ने दे
तिरे लिए जो मुझे राह से हटाते हैं
तुम्हारे ख़्वाब ग़नीमत हैं बुझती आँखों को
मगर ये ख़्वाब हमें नींद से जगाते हैं
ये कौन बाग़ में 'साहिर' दिखाई देने लगा
कि फूल पेड़ परिंदे ख़ुशी मनाते हैं
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यक़ीन जान बहुत डर गया था उस दिन जब
गले से तू ने अचानक लगा लिया था मुझे
बिछड़ गए हैं तो सारा क़ुसूर है तेरा
कि तू ने सर पे जो इतना चढ़ा लिया था मुझे
मैं इतनी देर कहीं बैठ ही नहीं सकता
किसी ने हाथ पकड़ कर बिठा लिया था मुझे
जो इस तरह से मुझे ख़र्च कर रहा है तू
ये चंद रोज़ में कितना कमा लिया था मुझे
मुझे ख़ुशी है सुहूलत से अब मरूँगा मैं
कि एक बार तो उस ने बचा लिया था मुझे
वो सर्द शाम वो बारिश वो लापता यादें
किसी ने शाल में 'साहिर' छुपा लिया था मुझे
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फ़क़ीर मौजी ख़राब हालों का क्या बनेगा
ये इश्क़ करती उदास नस्लों का क्या बनेगा
ये इश्क़ करती उदास नस्लों का क्या बनेगा
हमारे पुरखों ने हम से बेहतर गुज़ार ली है
मैं सोचता हूँ हमारे बच्चों का क्या बनेगा
हमारे जिस्मों का ख़ाक होना तो ठीक है पर
तुम्हारी आँखों तुम्हारे होंटों का क्या बनेगा
हमें तो रोने में कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन
वो पूछना था कि रोने वालों का क्या बनेगा
मज़ाक़ उड़ाते हैं लोग फ़र्ज़ी कहानियों का
कि सीधे-सादे से उन बुज़ुर्गों का क्या बनेगा
तलाश करती हैं इस बदन की बशारतों को
हक़ीर सोचों हरीस बाँहों का क्या बनेगा
वो हुस्न ऐसे ही ख़र्च होता रहा तो साहिर
हमारी नज़्मों हमारी ग़ज़लों का क्या बनेगा
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नींद से मुझ को जगाता है चला जाता है
वो मिरे ख़्वाब में आता है चला जाता है
वो मिरे ख़्वाब में आता है चला जाता है
और में टेक हटाता नहीं दरवाज़े से इश्क़ आवाज़ लगाता है चला जाता है
छेड़ वो राग लहू आँख से निकले दिल का
तो भी क्या गीत सुनाता है चला जाता है
मेरा किरदार कहानी में फ़क़त इतना है
कोई रोता हुआ आता है चला जाता है
रोज़-ए-अव्वल का थका हारा मुसाफ़िर इक दिन
बोझ काँधों से गिराता है चला जाता है
एक तबक़ा तो कई नस्ल से इस दुनिया से
ख़्वाब आँखों में सजाता है चला जाता है
तुझ को मालूम नहीं तेरी तलब का लम्हा
कितनी सदियों को मिटाता है चला जाता है
जिस तरह से ये ज़मीं घूम रही है साहिर
बात ऐसे वो घुमाता है चला जाता है
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