Janan Malik

Top 10 of Janan Malik

    कैसा अब्र है जिस के बरसने की
    हर पल उम्मीद लिए
    आँखें तिश्ना-लब रहती हैं
    उस को देख के
    ये किश्त-ए-बारानी भरती है
    ये जन्मों की प्यास हो जैसे इस मिट्टी की
    एक इक बूँद उतरती मुझ से बातें करती है
    पहले मैं बारिश को देख के ख़ुश होती थी
    अब मैं इस में भीग के इस की बातें सुनती हूँ
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    कैसा अब्र है जिस के बरसने की
    हर पल उम्मीद लिए
    आँखें तिश्ना-लब रहती हैं
    इस को देख के
    ये किश्त-ए-बारानी भरती है
    ये जन्मों की प्यास हो जैसे इस मिट्टी की

    एक इक बूँद उतरती मुझ से बातें करती है
    पहले मैं बारिश को देख के ख़ुश होती थी
    अब मैं इस में भीग के इस की बातें सुनती हूँ
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    Janan Malik
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    तुम ने कभी सोचा है
    तुम्हारी ये गहरे सन्नाटों में डूबी ख़ामुशी इस दरयूज़ा-गर पर कितनी भारी पड़ती है
    वो बातें जो
    तुम्हारे मिज़ाज-ए-मुअल्ला की नफ़ासतों पे गिराँ गुज़रती हैं मेरे लिए क्या मा'नी रखती हैं
    क्या
    कभी तुम ने पुर-सुकूत समुंदर के अंदर बिफरी उन लहरों की आवाज़ सुनी है जो किसी तूफ़ान का पेश-ख़ेमा होती हैं
    मैं ने सुनी है
    मुझ से पूछो
    तुम्हारी ख़ामुशी में लिपटे किसी तूफ़ान का साइरन क्या जानते हो तुम
    मैं ने सुना है
    तुम्हारे होंटों से गौहर-ए-नायाब की तरह निकला एक एक लफ़्ज़ तुम्हारी ये ठंडे मीठे चश्में जैसी बातें और शीरीं अंदाज़-ए-सुख़न सहरा में
    चलते मुसाफ़िर की तरह मेरे वजूद को सैराब करता है
    मैं जो तुम्हारे दर के आगे अपना दामन फैलाए उन नायाब मोतियों को चुनने की चाहत में बैठी रहती हूँ
    जिसे कभी तो तुम ना-मुराद लौटा देते हो कभी बहुत मेहरबाँ हो कर कुछ ख़ैरात
    उस के दामन में डाल जाते हो
    जिस को मैं तुम्हारी गलियों की दरयूज़ा-गर किसी क़ीमती असासे की तरह
    चुन के अपनी पोटली में रख लेती हूँ
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    Janan Malik
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    आगही का दुख तुम क्या जानो
    किस अज़िय्यत से गुज़रना पड़ता है
    जब इस के साँप
    गले में लिपट जाते हैं
    और भींचते हैं
    साँसें रुक जाती हैं
    बार बार फुंकारते और डसते हैं
    सुब्ह-ओ-शाम रात-दिन
    उन का ज़हर रग-ओ-पै में उतर जाता है
    मेरे लहू में सरायत करता है
    मैं टूटती फूटती रहती हूँ
    काँच की तरह
    रेत की तरह
    खन्खनाती हुई मिट्टी की तरह
    मेरी नस नस से लहू बहता है
    शाम ही से मेरे बिस्तर पर आसन जमा लेते हैं
    मुझे सोने नहीं देते
    करवट करवट मुझे डसते हैं
    लेकिन ये साँप मैं ने ख़ुद
    अपने लहू से पाले हैं
    अपने वजूद के अंदर
    'शकेब' 'सरवत' और ‘सारा’ ने भी पाले थे
    उन्हें भी नींद नहीं आती थी
    आख़िर-ए-कार वो रेल की पटरी पर जा कर
    मीठी नींद सो गए
    शायद ये
    रेल की सीटियों से बहुत डरते हैं
    रेल की पटरी को पार नहीं कर पाते
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    Janan Malik
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    मैं नज़्म अधूरी लिख लाई हूँ
    तुम इस नज़्म को उनवाँ दे दो
    तुम ये नज़्म मुकम्मल कर दो
    लेकिन तुम इस गहरी चुप में
    क्या इस नज़्म को तुम अंजाम नहीं दोगे
    इस को नाम नहीं दोगे
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    Janan Malik
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    तमाम दिन तुम्हारे मैसेजेज़ मेरे दिल की मुंडेरों पर कबूतरों की तरह उतरते हैं
    सफ़ेद दूधिया सियाह चश्म शरबती और सुरमई माइल जंगली कबूतर जिन के सीने के बाल
    कई रंगों में दमकते हैं
    सब्ज़-गूँ नीलगूँ और ताबदार तपते हुए ताँबे के जैसे

    मैं उन की ज़बान समझती हूँ
    ग़ुटरग़ूँ ग़ुटरग़ूँ
    कितनी परवाज़ कर के आते हैं

    शाम से मैं उन के साथ
    एक काबुक में बंद हो जाती हूँ
    वो मेरे बाज़ुओं कंधों और मेरे सर पर बैठ जाते हैं

    मुझे सुब्ह तक सोने नहीं देते
    उन के पर सेहर-अंगेज़ लफ़्ज़ों की तरह
    अपने मआ'नी खोलते हैं

    तुम्हें मालूम है पर लफ़्ज़ों की तरह होते हैं खुलते हैं मआ'नी की तरह
    तह-दर-तह
    अलामतें
    रम्ज़-निगारी
    और इशारे किनाए सब कुछ
    और ये लफ़्ज़ अपने साथ नींदें उड़ा कर ले जाते हैं
    रात मेरी नींदें ले कर गली में
    सीटियाँ मारती है
    और ख़्वाब खिड़कियों पर दस्तकें देते हैं

    तुम अपनी करवट बदलते हो
    और रात अपनी पोशाक

    मैं उन के पैरों में
    मोतियों वाली झाँझरें डालती हूँ
    ये अपना अपना दाना दुन्का चुग कर
    तुम्हारी ओर उड़ जाते हैं
    और फिर एक नई डार उतरती है
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    Janan Malik
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    मल्गजे से धुँदलके में जब तुम यूनिवर्सिटी से
    लौट रहे होते हो
    वहीं कैम्पस के बाहर
    मैं भी तो बैठी होती हूँ
    कभी न ख़त्म होने वाले इंतिज़ार में
    मैं तुम्हें देख रही होती हूँ
    और तुम
    पास से ऐसे गुज़र जाते हो
    जैसे वाक़िफ़ ही न हो
    मैं वहीं दहलीज़ पे बैठी रह जाती हूँ
    फिर पुल के पास से जब तुम गुज़रते हुए
    डूबते सूरज को एक नज़र देखते हो
    दूर कहीं उस डूबते सूरज की सुर्ख़ ताँबे ऐसी रौशनी से तुम्हारी दहकती जबीं पर
    जब दराड़ें पड़ने लगती हैं
    मैं तब भी तुम्हें देख रही होती हूँ
    गली का बल्ब रौशन करते हुए
    एक पल के लिए सोच में पड़ जाती हूँ
    अब भला मेरे लिए मन्न-ओ-सल्वा क्यूँ उतरने लगा
    मैं दरवाज़ा खोले ज़िंदगी का इंतिज़ार करती हूँ
    मगर वो मेरे हाथ नहीं आती
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    Janan Malik
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    मैं ने एक सूखते पेड़ पर
    नज़्म लिखना शुरूअ' की
    मेरे अंदर पीले पत्तों के ढेर लग गए
    मैं ने हवा पर नज़्म लिखी
    मेरे अंदर शाख़ें फूटने लगीं
    फूल मेरी हथेलियों से
    बाहर निकल आए
    मैं ने बारिश पर नज़्म लिखी
    मेरी चादर के पल्लू भीग गए
    जिन को सुखाने के लिए
    मैं ने
    धूप पर नज़्म लिखी
    सूरज सवा नेज़े पर आ गया
    पेड़ जलने लगे
    और परिंद मरने लगे
    मैं ने बादलों के लिए हाथ उठाए
    फिर कश्तियाँ कम पड़ गईं
    लोग डूबने लगे
    मैं ने डूबने वालों पर नज़्म लिखना चाही
    लाशें ही लाशें मेरी चारों जानिब तैरने लगीं
    हर एक लाश कहने लगी
    पहले मुझ पर लिखो
    पहले मुझ पर
    मैं ने इस शोर में
    अपनी भी चीख़ें सुनीं
    फिर मेरे अंदर
    एक गहरे और पुर-असरार सुकूत ने बसेरा कर लिया
    अब मैं इस सुकूत की मेज़बानी करती हूँ
    इसी के साथ बातें करती हूँ
    सोती और जागती हूँ
    दीवारें मेरे लिए
    लिबास बनती रहती हैं
    खिड़कियाँ और रौशन-दान मेरे वजूद के घाव हैं
    जिन पर
    हर आती हुई सुब्ह और ढलती हुई शाम
    अपना अपना मरहम रखती हैं
    और मुझ से कहती हैं हम पर भी नज़्म लिखना जब ये घाव भर जाएँ
    गली में खेलते बच्चे
    कभी कभी
    खिड़की के शीशे से आँखें चिपका कर
    अंदर झाँकने की कोशिश करते हैं
    उन्हें कौन ये समझाए
    चीज़ों के अंदर झाँकने की कोशिश
    शाइ'र बना देती है
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    Janan Malik
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    याद है उस ने मुझ से कहा था
    जानाँ
    बैठो
    आज बड़े दिन बा'द आई हो
    शायद तुम तो इन गलियों को इन रस्तों को दरवाज़ों को
    इक मुद्दत से भूल चुकी हो
    रिश्तों के दरवाज़ों से दरवाज़े मिलते हैं
    और दीवारें दीवारों से
    आँखों से ओझल होने से
    रिश्ते कम नहीं पड़ जाते
    उस ने कहा फिर
    बैठो जानाँ चाय पिओगी
    आज तुम्हें मैं अपने हाथ की चाय ला कर देता हूँ
    पी कर मुझे बताना तुम
    कैसी है ये
    जानती हो ना मुझे
    भुलक्कड़ सा हूँ मैं
    चीज़ें अक्सर रख कर कहीं पे भी
    खो जाता हूँ
    सोचों में गुम हो जाता हूँ
    याद नहीं रहता है अक्सर
    चीनी डाली है या फीकी
    लेकिन छोड़ो मेरी गुमशुदगी की बातें
    चाय पी कर बतलाना तुम
    इस में मीठा कम या ज़ियादा
    या फीकी है
    मीठा डालना भूल गया हूँ
    या फिर
    उस के चेहरे पर आई
    उस एक तमन्ना की वो रंगत
    शादाबी मैं देख रही थी
    उस की आँखें मेरे लबों से
    दाद-तलब थीं
    उस की आँखें ढूँड रही थीं जाने क्या
    मेरी आँखों में
    उस ने कहा फिर
    जानाँ
    चाय मीठी हुई तो तुम जैसी है
    फीकी हुई तो मुझ जैसी
    हँसते हँसते चाय का फिर सिप लिया मैं ने
    उस का ध्यान बटा कर
    फिर बातों बातों में मैं ने
    उस का कप भी पी डाला
    उस चेहरे की शादाबी
    के मुरझाने से पहले पहले
    उस इक फूल के कुम्हलाने से पहले पहले
    चाहत के मौसम की सरहद
    मीठे फीके
    दो लफ़्ज़ों की दूरी पर है
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    Janan Malik
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    बाबा ऐसे में तुम याद बहुत आते हो
    कैसी रुत है
    ऐसी रुत में
    आँखें क्यूँ भर आती हैं
    क्यूँ तन-मन से हूक उठती है
    क्यूँ जीवन बे-मा'नी सा लगने लगता है
    घर सूना वीरान ये आँगन
    और कमरों में वहशत
    बाबुल मैं तन्हा
    मेरी क़ीमत तुझ बिन क्या है
    कुछ भी नहीं है
    मैं तो काँच का मोती हूँ
    बाबुल का आँगन तो सावन में याद आया करता है
    लेकिन बाबा मैं तो पतझड़ देख के रोती हूँ
    बाबा ऐसे में तुम याद बहुत आते हो
    रात को सूखे पत्ते
    सहन में गिरते हैं
    गुज़रे दिन कब फिरते हैं
    फिर आती रुत फूल खिलेंगे
    फिर क़ब्रों पर रोना
    और क़ब्रों सा होना
    मिट्टी की तह में भी जा कर
    रिश्ते कब मिटते हैं
    दर्द की दीमक जिस्म को चाटती रहती है
    और साँसों के धागे काटती रहती है
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    Janan Malik
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