देखिए हम किस क़दर हैं बे-नियाज़
कुछ न माँगा हुस्न की सरकार से
ऐ निगाह-ए-नाज़ तेरा शुक्रिया
मुतमइन है दिल तिरी गुफ़्तार से
किस लिए हूँ ज़िंदगी से बद-गुमाँ
काश वो पूछे किसी दिन प्यार से
ज़िंदगी भी हम से है बेज़ार सी
ज़िंदगी से हम भी हैं बेज़ार से
हर बशर के वास्ते है लाज़मी
काम ले शीरीनी-ए-गुफ़्तार से
आप की ख़ातिर हुए बर्बाद हम
आप भी हैं हम से कुछ बेज़ार से
दोस्ती उन से निभेगी किस तरह
मैं हूँ दीवाना तो वो होशियार से
ग़ैर तो फिर ग़ैर हैं 'आसी' मगर
आप भी कुछ कम नहीं अग़्यार से
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ये हाहा-कार कुछ है
ग़लत सरकार कुछ है
ग़लत सरकार कुछ है
सियासत यार कुछ है
वतन से प्यार कुछ है
मोहब्बत प्यार कुछ है
हमें दरकार कुछ है
ये उस के पार कुछ है
मज़ा मझंदार कुछ है
कहीं इसरार कुछ है
उफ़ुक़ के पार कुछ है
दवा तीमार कुछ है
मुझे आज़ार कुछ है
न तुम वो हो न मैं हूँ
समय की मार कुछ है
किसे तेरी ख़बर दूँ
कहीं घर-बार कुछ है
दिलों में रब्त-ए-बाहम
अगर दुश्वार कुछ है
सुकूँ से चैन से हूँ
यक़ीनन हार कुछ है
मोहब्बत और 'आसी'
पस-ए-दीवार कुछ है
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सिर्फ़ इक इश्क़ ग़ैर-फ़ानी है
वर्ना हर चीज़ आनी-जानी है
जो नहीं आश्ना मोहब्बत से
दिल पे उस बुत की हुक्मरानी है
मौत और ज़िंदगी में है ये फ़र्क़
इक हक़ीक़त है इक कहानी है
याद तेरी है ज़ीस्त का हासिल
ग़म तिरा वज्ह-ए-शादमानी है
चश्म-ए-पुर-नम ये मेरी ख़ामोशी
दिल के ज़ख़्मों की तर्जुमानी है
क्या बुरा जो किसी के काम आए
जान इक दिन तो ख़ैर जानी है
जाँ है अटकी लबों पर ऐ 'आसी'
चारासाज़ों की मेहरबानी है
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दुनिया-ए-मोहब्बत बड़ी दिलकश है हसीं है
हर एक को रास आए ज़रूरी तो नहीं है
माना कि ज़माने का हर इक नक़्श हसीं है
इस पर भी ज़माने में कोई तुझ सा नहीं है
इक अर्ज़-ए-तमन्ना के सिवा हम ने किया क्या
किस बात पे वो शो'ला-बदन चीं-ब-जबीं है
क्या ख़ाक हो मेरे दिल-ए-बेताब का दरमाँ
जब तुझ पे तिरी चश्म-ए-तवज्जोह ही नहीं है
दिल में है मगर जज़्बा-ए-इख़्लास-ओ-मोहब्बत
वो ख़ुद ही खिंचे आएँगे ये मेरा यक़ीं है
क्या कहिए मोहब्बत में अजब हाल है अपना
नज़रें हैं कहीं और तो दिल और कहीं है
रह रह के खटकता है जो हर साँस में पैहम
सीने में कोई ख़ार है या क़ल्ब-ए-हज़ीं है
इक़रार-ए-वफ़ा कर भी चुकीं तेरी निगाहें
अफ़्सोस तिरे लब पे मगर फिर भी नहीं है
इस बुत का कोई अहद भी ईफ़ा नहीं होता
क्या इस का यक़ीं जिस का न ईमाँ है न दीं है
क्या तुरफ़ा-क़यामत है मिरी वज्ह-ए-तबाही
वो पूछते हैं और मुझे याद नहीं है
शर्मिंदा-ए-एहसाँ मैं नहीं राह-नुमा का
'आसी' मिरा रहबर तो मिरा अज़्म-ओ-यक़ीं है
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उठाया ही नहीं जाता जो बार-ए-ज़िंदगी हम से
किनारा कर चुकी शायद किसी की याद भी हम से
किनारा कर चुकी शायद किसी की याद भी हम से
कभी मानूस थी कितनी बहार-ए-ज़िंदगी हम से
मगर दामन-कशाँ है आज-कल हर इक ख़ुशी हम से
शब-ए-ग़म इस तरह भी कट गई है बारहा अपनी
किसी की याद पहरों गुफ़्तुगू करती रही हम से
किसी के वास्ते तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ मश्ग़ला ठहरा
हमारे दिल पे जो गुज़री है वो पूछे कोई हम से
किसी को शाद-कामी है किसी को ना-मुरादी है
मिलेंगे राह-ए-उल्फ़त में कोई तुम से कोई हम से
तिरी चश्म-ए-करम की वो तवज्जोह ही नहीं वर्ना
कहाँ थी इस क़दर बरहम हमारी ज़िंदगी हम से
बसा-औक़ात हम ने मय-कदे के दर पे दस्तक दी
तबीअ'त जब किसी सूरत न बहलाई गई हम से
कहाँ तक ख़ुद-फ़रेबी में रहें हम मुब्तला 'आसी'
लबों पे लाई जा सकती नहीं झूटी हँसी हम से
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सुब्ह-दम का मज़ा नहीं लेते
लोग ताज़ा हवा नहीं लेते
लोग ताज़ा हवा नहीं लेते
झूट का आसरा नहीं लेते
दर्द वाले दवा नहीं लेते
बरसर-ए-इक़्तिदार हूँ कब से
लोग क्यूँ फ़ाएदा नहीं लेते
कौन जाने वो दिल से देता हो
हम किसी की दुआ नहीं लेते
बे-झिझक अब मिला करो हम से
आज-कल हम दवा नहीं लेते
जिन के रौशन ज़मीर होते हैं
दूर से ज़ाइक़ा नहीं लेते
इश्क़ होता है अपने बूते पर इश्क़ में मशवरा नहीं लेते
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नासाज़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया है
दुनिया की हर इक बात ने दिल तोड़ दिया है
दुनिया की हर इक बात ने दिल तोड़ दिया है
कुछ साक़ी-ए-महफ़िल भी रहा रिंदों से बरहम
कुछ शिद्दत-ए-आफ़ात ने दिल तोड़ दिया है
आग़ाज़-ए-मुलाक़ात में क्या जोश था दिल में
अंजाम-ए-मुलाक़ात ने दिल तोड़ दिया है
बेहाल-ओ-परेशाँ है बशर रोज़-ए-अज़ल से
फ़र्सूदा रिवायात ने दिल तोड़ दिया है
अपनों की इनायात का हम ज़िक्र करें क्या
अपनों की इनायात ने दिल तोड़ दिया है
कल आप की हर बात से तस्कीन मिली थी
आज आप की हर बात ने दिल तोड़ दिया है
हम तिश्ना-दहन बैठे हैं मयख़ाने मैं 'आसी'
उमड़ी हुई बरसात ने दिल तोड़ दिया है
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ज़िंदगानी जब हमें रास आएगी
देख लेना मौत भी आ जाएगी
देख लेना मौत भी आ जाएगी
वो नज़र जब भी करम फ़रमाएगी
लाज़िमन दुनिया हमें अपनाएगी
मेरे घर से शाम-ए-ग़म कब जाएगी
आज जाएगी तो कल फिर आएगी
कौन ज़िंदा रह सकेगा बिन तिरे
किस से ये तोहमत उठाई जाएगी
कौन जाने क्या हो फिर तौबा का हश्र
मय-कदे पर जब घटा घर आएगी
एक दिन हम ख़ाक में मिल जाएँगे
हर हक़ीक़त दास्ताँ बन जाएगी
क्या करूँ उन की नसीहत का गिला
दोस्तों से और क्या बन आएगी
मैं न कहता था न पूछें मेरा हाल
आप को सुन कर हँसी आ जाएगी
गर्दिश-ए-दौराँ को समझा दीजिए
हम से उलझेगी तो मुँह की खाएगी
वो मिटाने को हैं ऐ 'आसी' हमें
ये ख़लिश भी एक दिन मिट जाएगी
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दर्द वाले हो तो फिर ऐसा करो
साथ कुछ हमदर्द भी रक्खा करो
साथ कुछ हमदर्द भी रक्खा करो
अपना बेगाना न तुम देखा करो
हर किसी से मस्लहत बरता करो
दूसरों के दर्द की छोड़ो मियाँ
पहले अपने दर्द का चारा करो
गो बुलंदी हो कि पस्ती हर जगह
ज़ेहन-ओ-दिल दोनों खुले रखा करो
इस क़दर ख़ामोशियाँ अच्छी नहीं
लोग क्या सोचेंगे कुछ सोचा करो
जिस को जो होना है हो ही जाएगा
कौन क्यूँ कैसे है कम सोचा करो
साफ़ दिख जाएँगे चेहरे के नुक़ूश
आईना नज़दीक से देखा करो
हम-सफ़र होंगे तो बिछड़ेंगे ज़रूर
इस लिए इक इक सफ़र तन्हा करो
हर-नफ़स 'आसी' ख़ुदा की देन है
हर-नफ़स इक चौकसी बरता करो
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बैठे हो सर-ए-राहगुज़र क्यूँ नहीं जाते
तुम लोग तो घर वाले हो घर क्यूँ नहीं जाते
तुम लोग तो घर वाले हो घर क्यूँ नहीं जाते
ये वक़्त के हाकिम हैं सुना वक़्त के हाकिम
ये कहते हैं मर जाओ तो मर क्यूँ नहीं जाते
इस बात से ज़ाहिर है तुम्हीं एक ख़ुदा हो
हम वर्ना किसी और के दर क्यूँ नहीं जाते
पल ही में गुज़र जाती है सुख-चैन की रातें
दुख-दर्द के दिन पल में गुज़र क्यूँ नहीं जाते
मुद्दत से कुरेदे भी नहीं याद किसी की
फिर ज़ख़्म मिरे सीने के भर क्यूँ नहीं जाते
इस दौर में जीना है तो मक्कार का जीना
ये बात हक़ीक़त है तो मर क्यूँ नहीं जाते
इतने ही अगर तंग हो इस शहर से 'आसी'
चुपके से किसी दूर नगर क्यूँ नहीं जाते
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