Pandit Vidya Rattan Asi

Pandit Vidya Rattan Asi

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Pandit Vidya Rattan Asi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Pandit Vidya Rattan Asi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
मुफ़लिसों पर जब कभी आया शबाब
घड़ लिए दुनिया ने क़िस्से बे-हिसाब

कौन जाने उन की क्या ता'बीर हो
हम ने आँखों में सजाए हैं जो ख़्वाब

लड़खड़ा जाएँ न क्यूँ हम बे-पिए
उन की आँखों से छलकती है शराब

हाए हम उस का मुक़द्दर क्या कहें
एक दिल है और ग़म हैं बे-हिसाब

लज़्ज़त-ए-शीरीनी-ए-हस्ती कहाँ
तल्ख़ियों में कट गया दौर-ए-शबाब

राहबर ने हर क़दम धोका दिया
मैं ये समझा मेरी क़िस्मत है ख़राब

दरहम-ओ-बरहम है नज़्म-ए-ज़िंदगी
ऐ ग़म-ए-दौराँ तिरा ख़ाना-ख़राब

होश कर ऐ शोख़ अब भी वक़्त है
तुझ को ले डूबेंगे ये जन्नत के ख़्वाब

हम से दुनिया ने छुपाए थे जो राज़
ख़ुद-ब-ख़ुद होने लगे वो बे-नक़ाब

ज़िंदगी भर हज़रत-ए-'आसी' रहे
रहगुज़ार-ए-शौक़ मैं ना-कामयाब
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Pandit Vidya Rattan Asi
क्यूँ न हम आज हक़ीक़त ही बता दें अपनी
जिस्म अपना ही न इस जिस्म में साँसें अपनी

सच तो ये है कि कभी ख़ुद को तलाशा ही न था
और आई भी न थीं बरसों से यादें अपनी

बोझ इस दिल का किसी रोज़ तो हल्का होगा
खुल के बरसेंगी किसी रोज़ तो आँखें अपनी

अब ये आलम है हम इक दूजे को सुन लेते हैं
और ख़ामोश भी रखते हैं ज़बानें अपनी

जाने किस वक़्त हो अंदर के सफ़र का आग़ाज़
जाने कब ख़त्म हों बाहर की ये दौड़ें अपनी

मुझ को पहले ही से इरफ़ान का है नश्शा बहुत
मेरे आगे से हटा लो ये शराबें अपनी

अब तो हर सम्त नज़र आता है जल्वा अपना
अब तो जिस सम्त भी उठती हैं निगाहें अपनी

आइना आइना है आप को क्या देखेगा
देख सकती हैं कहाँ ख़ुद को निगाहें अपनी

रूह की प्यास है लफ़्ज़ों से कहाँ बुझती है
बंद कर दो ये सहीफ़े ये किताबें अपनी

एक तू ही तो समझ सकता है 'आसी' वर्ना
कौन समझेगा तिरे शहर में बातें अपनी
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Pandit Vidya Rattan Asi
फिर परेशाँ-हाल है क़ल्ब-ओ-जिगर क्या कीजिए
अब इलाज-ए-गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर क्या कीजिए

मेहरबाँ हो भी अगर अब चारा-गर क्या कीजिए
कर चुका है दर्द ही इस दिल में घर क्या कीजिए

देखिए कब मौत का झोंका बुझा डाले इसे
ज़िंदगी है इक चराग़-ए-रहगुज़र क्या कीजिए

हम से होता ही नहीं दर्द-ए-मोहब्बत का इलाज
अब यही करते हैं हम कुछ सोच कर क्या कीजिए

राहत-ओ-आराम का इस में नहीं कोई गुज़र
हो रही है ज़िंदगी फिर भी बसर क्या कीजिए

जब हमारे लब पे आती है कभी मतलब की बात
हँस दिया करते हैं वो मुँह फेर कर क्या कीजिए

सोचते हैं हाल-ए-दिल हो किस तरह उन से बयाँ
वो बिगड़ जाते हैं हर इक बात पर क्या कीजिए

हम ने जिन की चाह में बर्बाद कर दी ज़िंदगी
हम पे होती ही नहीं उन की नज़र क्या कीजिए

हम ने 'आसी' उन का हर इल्ज़ाम अपने सर लिया
अपने दुश्मन थे हमीं कुछ इस क़दर क्या कीजिए
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किसी के रंज-ओ-ग़म में जो बशर शामिल नहीं होता
वो दुनिया में कभी ताज़ीम के क़ाबिल नहीं होता

मरीज़-ए-इश्क़ से ऐ चारा-गर ये बे-रुख़ी कैसी
किसी बेबस का दिल रखना कोई मुश्किल नहीं होता

निहायत बे-मज़ा होती है वो रूदाद उल्फ़त की
तुम्हारा ज़िक्र जिस रूदाद में शामिल नहीं होता

कोई पूछे मिरे दिल से ज़रा महफ़िल की वीरानी
कभी महफ़िल में जब वो रौनक़-ए-महफ़िल नहीं होता

हक़ीक़त में उन्हीं को ज़िंदगानी रास आती है
वो जिन के वास्ते मरना कोई मुश्किल नहीं होता

सुलूक-ए-दहर का शिकवा कभी करते नहीं वर्ना
सुलूक-ए-दहरस ग़ाफ़िल हमारा दिल नहीं होता

मोहब्बत की कोई मंज़िल नहीं होती ज़माने में
ये वो दरिया है जिस का कोई भी साहिल नहीं होता

तिरी बातों पे ऐ नासेह यक़ीं हम किस तरह कर लें
ये वो बातें हैं जिन बातों से कुछ हासिल नहीं होता

फ़क़त साक़ी का दिल रखने को पी लेता हूँ ऐ 'आसी'
किसी सूरत में वर्ना शामिल-ए-महफ़िल नहीं होता
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मौजों से टकराए हैं हम तूफ़ानों से खेले हैं
इक जीने की ख़ातिर हम ने क्या क्या सद
में झेले हैं

क़ल्ब-ओ-नज़र के अफ़्साने ये रौनक़-ए-बज़्म-ए-ऐश-ओ-तरब
जीते जी की बातें हैं सब जीते जी के मेले हैं

उन के दम से रौनक़-ए-हस्ती उन के दम से ये दुनिया
ख़ाक-बसर हैं ज़ाहिर में जो लोग बड़े अलबेले हैं

ये अपनी हिम्मत थी हम हर मौज-ए-बला से पार हुए
खेल बहुत दिल-दोज़ थे वर्ना तक़दीर ने खेले हैं

सोचते हैं हम तिश्ना-लबों को किस ने आज नवाज़ा है
किस ने अपनी मस्त नज़र से रंगीं जाम उंडेले हैं

उन लोगों पर काश तरी कुछ चश्म-ए-इनायत हो जाती
जिन लोगों ने तेरी ख़ातिर बरसों सद
में झेले हैं

'आसी' ज़ीस्त की राहों में मिल जाए किसी का साथ मगर
ये तक़दीर की बातें हैं सब ये तक़दीर के मेले हैं
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न रुस्वा इस तरह करते बुला कर मुझ को महफ़िल में
अगर पास-ए-वफ़ा होता ज़रा भी आप के दिल में

न अब वो वलवले बाक़ी न अब वो हौसले दिल में
मिरा होना न होना एक है दुनिया की महफ़िल में

हवादिस से है निस्बत ख़ास ऐसे ज़िंदगानी को
है क़ाएम रब्त-ए-बाहम जिस तरह दरिया-ओ-साहिल में

बड़ी मुद्दत से ये आलम न जीता हूँ न मरता हूँ
बड़ी मुद्दत से मेरी ज़िंदगी है सख़्त मुश्किल में

अभी कोई बला टूटी अभी कोई सितम टूटा
रहा जब तक मैं ज़िंदा इक यही ख़दशा रहा दिल में

मिरी हस्ती की कश्ती का ठिकाना ही नहीं कोई
अभी आग़ोश-ए-तूफ़ाँ में अभी आग़ोश-ए-साहिल में

तुम्हीं सोचो मिरा जीना कोई जीने में जीना है
न कोई आरज़ू दिल में न कोई मुद्दआ' दिल में

सफ़ीना ज़िंदगी का नज़्र-ए-तूफ़ाँ कर दिया 'आसी'
तुझे आख़िर ये क्या सूझी ये क्या आई तिरे दिल में
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Pandit Vidya Rattan Asi
ग़ाफ़िल हूँ तिरी याद से ऐसा तो नहीं है
हर-वक़्त मिरे दिल में तिरी याद मकीं है

दुनिया-ए-मोहब्बत बड़ी दिलकश है हसीं है
हर एक को रास आए ज़रूरी तो नहीं है

माना कि ज़माने का हर इक नक़्श हसीं है
इस पर भी ज़माने में कोई तुझ सा नहीं है

इक अर्ज़-ए-तमन्ना के सिवा हम ने किया क्या
किस बात पे वो शो'ला-बदन चीं-ब-जबीं है

क्या ख़ाक हो मेरे दिल-ए-बेताब का दरमाँ
जब तुझ पे तिरी चश्म-ए-तवज्जोह ही नहीं है

दिल में है मगर जज़्बा-ए-इख़्लास-ओ-मोहब्बत
वो ख़ुद ही खिंचे आएँगे ये मेरा यक़ीं है

क्या कहिए मोहब्बत में अजब हाल है अपना
नज़रें हैं कहीं और तो दिल और कहीं है

रह रह के खटकता है जो हर साँस में पैहम
सीने में कोई ख़ार है या क़ल्ब-ए-हज़ीं है

इक़रार-ए-वफ़ा कर भी चुकीं तेरी निगाहें
अफ़्सोस तिरे लब पे मगर फिर भी नहीं है

इस बुत का कोई अहद भी ईफ़ा नहीं होता
क्या इस का यक़ीं जिस का न ईमाँ है न दीं है

क्या तुरफ़ा-क़यामत है मिरी वज्ह-ए-तबाही
वो पूछते हैं और मुझे याद नहीं है

शर्मिंदा-ए-एहसाँ मैं नहीं राह-नुमा का
'आसी' मिरा रहबर तो मिरा अज़्म-ओ-यक़ीं है
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Pandit Vidya Rattan Asi
उठाया ही नहीं जाता जो बार-ए-ज़िंदगी हम से
किनारा कर चुकी शायद किसी की याद भी हम से

कभी मानूस थी कितनी बहार-ए-ज़िंदगी हम से
मगर दामन-कशाँ है आज-कल हर इक ख़ुशी हम से

शब-ए-ग़म इस तरह भी कट गई है बारहा अपनी
किसी की याद पहरों गुफ़्तुगू करती रही हम से

किसी के वास्ते तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ मश्ग़ला ठहरा
हमारे दिल पे जो गुज़री है वो पूछे कोई हम से

किसी को शाद-कामी है किसी को ना-मुरादी है
मिलेंगे राह-ए-उल्फ़त में कोई तुम से कोई हम से

तिरी चश्म-ए-करम की वो तवज्जोह ही नहीं वर्ना
कहाँ थी इस क़दर बरहम हमारी ज़िंदगी हम से

बसा-औक़ात हम ने मय-कदे के दर पे दस्तक दी
तबीअ'त जब किसी सूरत न बहलाई गई हम से

कहाँ तक ख़ुद-फ़रेबी में रहें हम मुब्तला 'आसी'
लबों पे लाई जा सकती नहीं झूटी हँसी हम से
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