पहले तो इक ख़्वाब था ख़ाकिस्तर-ओ-ख़ावर के बीच
अब अँधेरी शब है हाइल उस के मेरे घर के बीच
अब अँधेरी शब है हाइल उस के मेरे घर के बीच
हादसे जैसे हैं सब देखे हुए समझे हुए
कोई हैरानी नहीं अब आँख और मंज़र के बीच
सब सिपाही अपनी अपनी ज़ात में मसरूफ़ थे
शाहज़ादा अब के तन्हा ही लड़ा लश्कर के बीच
अस्र-ए-हाज़िर के सिवा भी कुछ ज़माने और हैं
कुछ मनाज़िर और भी हैं आसमाँ मंज़र के बीच
एक ये तारीख़ है पढ़ते हैं जिस को आज हम
इक अलग तारीख़ भी है राम के बाबर के बीच
लो 'क़मर'-साहब ज़माना चाल अपनी चल गया
आप इतना ही चले बस घर के और दफ़्तर के बीच
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पानियों में रास्ता शो'लों में घर देखेगा कौन
ऐ गुमान-ए-ख़ुश-नज़र अब के उधर देखेगा कौन
ऐ गुमान-ए-ख़ुश-नज़र अब के उधर देखेगा कौन
चश्म-ए-पुर-नम सोज़-ए-दिल अपनी जगह लेकिन यहाँ
मौसम-ए-सर-सब्ज़ में रक़्स-ए-शरर देखेगा कौन
इस सदी से उस सदी तक रिश्ते-नाते दोस्ती
पीछे क्या क्या रह गया है लौट कर देखेगा कौन
दिरहम-ओ-दीनार हैं इनआ'म हिजरत का मगर
घर से गर सब ही चले जाएँ तो घर देखेगा कौन
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हमारी नींद कोई सो गया है क्या
जो था ख़्वाबों का ज़ेवर खो गया है क्या
जो था ख़्वाबों का ज़ेवर खो गया है क्या
सभी चेहरों पे है क्यूँ बद-हवा सेी अब
सभी का जैसे याँ कुछ खो गया है क्या
कोई फ़रियाद अब सुनता नहीं वो भी
कहीं पर चीफ़ जस्टिस हो गया है क्या
ये क्यूँ तालाब दरिया और समुंदर हैं
यहाँ पर कोई आ कर रो गया है क्या
'क़मर' का आइने में सिर्फ़ चेहरा है
सरापा भीड़ में अब खो गया है क्या
यूँ ही शादाब चेहरा हो नहीं सकता
छलक कर अश्क चेहरा धो गया है क्या
उगे हैं चार-सू नफ़रत के पौदे क्यूँ
दिलों में ज़ह्र कोई बो गया है क्या
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ज़वाल आ गया रिश्तों के चाँद-सूरज को
वो भी ख़मोश था और मैं भी चुप रहा अब के
और उस ने ढूँड लिया कोई साएबान नया
तमाम रात मैं ही भीगता रहा अब के
ये दूर दूर यज़ीदी की जैसे है तौसीअ'
मची है चारों-तरफ़ फिर से कर्बला अब के
मुझे तलाश करो तुम उफ़ुक़ के पास कहीं
ज़मीं से टूट गया मेरा राब्ता अब के
वो कोहर कोहरस चेहरे धुआँ धुआँ सी फ़ज़ा
'क़मर' मैं कैसे कोई ख़्वाब देखता अब के
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किसी के दस्त-ए-तलब को पुकारता हूँ मैं
उठाओ हाथ मुझे माँग लो दुआ हूँ मैं
उठाओ हाथ मुझे माँग लो दुआ हूँ मैं
मिरे अज़ल और अबद में नहीं है फ़स्ल कोई
अभी शुरूअ' अभी ख़त्म हो गया हूँ मैं
बसी है मुझ में युगों से अजीब वीरानी
बदन से रूह तलक बे-कराँ ख़ला हूँ मैं
न कोई आग है मुझ में न रौशनी न धुआँ
किसी के ख़्वाब में जलता हुआ दिया हूँ मैं
नज़र के वास्ते अपना नज़ारा काफ़ी है
ख़ुद अपना अक्स हूँ ख़ुद अपना आईना हूँ मैं
भटक रहा हूँ मैं बे-अंत शाह-राहों पर
तुम्हारे शहर में बिल्कुल नया नया हूँ मैं
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फिर वही ख़ाना-ए-बर्बाद हमारे लिए है
शहर-ए-ग़रनाता-ओ-बग़दाद हमारे लिए है
शहर-ए-ग़रनाता-ओ-बग़दाद हमारे लिए है
झेलना है हमें फिर कर्ब फ़रामोशी का
फिर वही सिलसिला-ए-याद हमारे लिए है
नींद के शहर-ए-तिलिस्मात मुबारक हों तुम्हें
जागते रहने की उफ़्ताद हमारे लिए है
ग़म हैं आशोब-ए-ख़ुदी में हमें वर्ना इक शहर
ख़ूँ से तर शोर से आबाद हमारे लिए है
ढूँडिए अक्स-ए-'क़मर' रात के आईने में
आज की शब यही इरशाद हमारे लिए है
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Qamar Siddiqi
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हर रोज़ नई जंग है हर रोज़ नई जेहद
कब अपने मुक़ाबिल कोई लश्कर नहीं होता
बे-सोचे हुए काम तो हो जाते हैं सारे
जो सोचते हैं हम वही अक्सर नहीं होता
हर पल वही वहशत है वही रक़्स-ए-सितम-नाक
किस लम्हा यहाँ फ़ित्ना-ए-महशर नहीं होता
आ लेते हैं जज़्बात को चुपके से किसी पल
उन हादसों का वक़्त मुक़र्रर नहीं होता
आवारा हैं इस आँख से उस आँख तलक ख़्वाब
जैसे कि मुसाफ़िर का कोई घर नहीं होता
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Qamar Siddiqi
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क्या रंज कि यूसुफ़ का ख़रीदार नहीं है
ये शहर कोई मिस्र का बाज़ार नहीं है
ये शहर कोई मिस्र का बाज़ार नहीं है
क्यूँ मेरी गिरफ़्तारी पे हंगामा है हर सू
वो कौन है जो तेरा गिरफ़्तार नहीं है
किस किस पे इनायत न हुई तेरी नज़र की
बस एक मिरी सम्त गुहर-बार नहीं है
क्यूँ जुरअत-ए-इज़हार पे हैरान हो मेरी
अबरू हैं तुम्हारे कोई तलवार नहीं है
साया है मिरे सर पे 'क़मर' धूप शजर का
बैठा हूँ जहाँ साया-ए-दीवार नहीं है
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