हमारी नींद कोई सो गया है क्या
जो था ख़्वाबों का ज़ेवर खो गया है क्या
सभी चेहरों पे है क्यूँ बद-हवा सेी अब
सभी का जैसे याँ कुछ खो गया है क्या
कोई फ़रियाद अब सुनता नहीं वो भी
कहीं पर चीफ़ जस्टिस हो गया है क्या
ये क्यूँ तालाब दरिया और समुंदर हैं
यहाँ पर कोई आ कर रो गया है क्या
'क़मर' का आइने में सिर्फ़ चेहरा है
सरापा भीड़ में अब खो गया है क्या
यूँ ही शादाब चेहरा हो नहीं सकता
छलक कर अश्क चेहरा धो गया है क्या
उगे हैं चार-सू नफ़रत के पौदे क्यूँ
दिलों में ज़ह्र कोई बो गया है क्या
— Qamar Siddiqi















