YAAR
YAAR
Ghazal

तमाशा है ग़ज़ल मेरी उसे इज़हार मत समझो

सुनाता हूँ यहाँ जो भी उसे किरदार मत समझो

किसी के ख़ूब-सूरत बोल को तुम प्यार मत समझो
मिला है बात करने को उसे तुम यार मत समझो

तुम्हें हर फ़लसफ़ा उस की नज़र से मिल गया होगा
अगर वो आँख भर के देख ले अख़बार मत समझो

बहुत थक सा गया हूँ ज़िंदगी आराम करने दो
उदासी शख़्सियत में है मुझे बीमार मत समझो

तुम्हारे सामने पर्दा करे या हुस्न दिख जाए
निशाँ गुज़रे मगर तुम जिस्म का हक़दार मत समझो

मुदावा आप के हर ज़ख़्म हर तकलीफ़ का होगा
कभी अपने ख़ुदा को बे-ख़बर बेज़ार मत समझो

सहर तक मैं यहीं ज़िंदा रहूँगा तुम चली आना
यहाँ मरना तुम्हारे हाथ से बेकार मत समझो

सभी का एक दिन मर कर चले जाना मुयस्सर है
कभी इन मक़्तलों को फूल से गुलज़ार मत समझो

कहोगी क्या रहे नाकाम हम वा'दा निभाने में
तुम्हें मालूम है सब कुछ हमें मक्कार मत समझो

भटकता हूँ बनारस की गली बाज़ार में दर दर
यहाँ पे हर किसी को तुम निगाह-ए-यार मत समझो

— YAAR

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