गर याद में साक़ी की साग़र नज़र आ जाए
पैमाना-ए-दिल छलके मुँह को जिगर आ जाए
अक्स-ए-रुख़ साक़ी को गर देख लूँ साग़र में
कुछ दिल के बहलने की सूरत नज़र आ जाए
तय्यार रहो हर-दम मरने पे कमर बाँधे
दर-पेश-ए-ख़ुदा जाने कब ये सफ़र आ जाए
हाँ सैर तू कर ग़ाफ़िल उस गोर-ए-ग़रीबाँ की
अंजाम तुझे अपना शायद नज़र आ जाए
फिर जाएँ हमेशा को दुनिया से मिरी आँखें
मरते दम अगर जल्वा तेरा नज़र आ जाए
शोर-ए-नफ़स-ए-बुलबुल से होश उड़ें सब के
गर ज़मज़मा-संजी पर ये मुश्त-ए-पर आ जाए
बीमार-ए-मोहब्बत की अब है ये दुआ हर-दम
फिर शाम न हो जिस की ऐसी सहर आ जाए
बेहतर है ख़म-ओ-साग़र आँखों से रहें ओझल
ऐसा न हो शीशे पर दिल टूट कर आ जाए
'यास' आप की बे-जुर्मी आड़े नहीं आ सकती
गर बात पर अपनी वो बेदाद-गर आ जाए















