मोहब्बत के ज़माने आ गए हैं
उसे रिश्ते निभाने आ गए हैं
मेरे अहबाब मुझ को कर के तन्हा
दुबारा दिल दुखाने आ गए हैं
शिफ़ाई जौन ग़ालिब मीर जैसे
हमें भी ग़म छुपाने आ गए हैं
तुम्हें देखा तो मुझ को याद फिर से
वही नग़
में पुराने आ गए हैं
बनाए चाँद तारे जब से मैं ने
मुझे कंगन बनाने आ गए हैं
— Yashvardhan Mishra 'Hind'















