उसे उजाले का ख़तरा सताता रहता है
पकड़ पकड़ के वो जुगनू बुझाता रहता है
दुआएँ देता है कोई न भीक माँगे यहाँ
मगर वो चाक पे कासे बनाता रहता है
हवा पे ज़ोर तो चलता नहीं है जुगनू का
मगर चराग़ की हिम्मत बढ़ाता रहता है
वो शख़्स जिस को अभी तैरना नहीं आता
वो डूबने के फ़वाएद गिनाता रहता है
ख़मोशियों से बड़ा रब्त था जिसे 'यासिर'
वो कैनवास पे चीख़ें बनाता रहता है
— Yasir Khan















