यूँँ तिरे शहर से हम यार चले आते हैं
जैसे का'बे से गुनहगार चले आते हैं
इश्क़ में क़ैस ने सहराओं को छाना होगा
हम वो मजनूँ हैं जो बाज़ार चले आते हैं
रात भर तुम भी उदासी का सबब बनते हो
दिन निकलता है तो अख़बार चले आते हैं
ये तिरे शहर की रुस्वाई नहीं तो क्या है
हम तिरे शहर से बीमार चले आते हैं
वो बुलाता है जिसे प्यार से अपनी जानिब
मैं तो पागल हूँ समझदार चले आते हैं
— Yasir Khan















