जागते सोते हुए लिखते हैं शे'र हम रोते हुए लिखते हैंजब भी लिखते हैं मुकम्मल ख़ुद कोकहीं कम होते हुए लिखते हैंसुब्ह से शाम तलक भागते हैंज़िंदगी ढोते हुए लिखते हैंकभी उड़ते हैं सितारों की तरफ़उन में गुम होते हुए लिखते हैंख़ुद-ब-ख़ुद सोना उगलती है ज़मीनहम तो दुख बोते हुए लिखते हैं— Yasmeen Hameed