भूख से जंग थी ज़िन्दगी की
हार कर भूख से ख़ुद-कुशी की
वो अँधेरों से घबरा गया है
है ज़रूरत उसे रौशनी की
हर गली जगमगाती है देखो
रात है कुछ अलग मुम्बई की
नफ़रतों को जगह ही नहीं दी
बस मुहब्बत की ही शा'इरी की
कह दिया उस ने मिलते ही दौलत
अब ज़रूरत नहीं है किसी की
दुश्मनी यूँ निभाई है उस ने
दुश्मनों से मिरे दोस्ती की
मैं मोहब्बत से मिलने लगा तो
उस ने भी नफ़रतों में कमी की
है ज़फर लखनऊ घर अदब का
है यहाँ क़द्र दानिश-वरी की
— Zafar Siddqui















