"जश्न-ए-चिराग़ाँ"
डूबा हुआ जो नूर में हिन्दोस्तान है
मंज़र ये देख रश्क-कुना आसमान है
हर सिम्त है ख़ुलूस-ओ-मुहब्बत की रौशनी
आती नहीं नज़र भी यूँ नफ़रत की तीरगी
कुछ इस तरह से होते हैं अफ़राद हम-ज़बाँ
हो कोई तिफ़्ल-ओ-पीर-ओ-जवाँ, सब हैं शादमाँ
इमशब जुदा चिराग़ों का हुस्न-ओ-जमाल है
हर इक चराग़ आप में ही बे-मिसाल है
नग़्मा-सरा हुई है सितारों की अंजुमन
ओढ़े है ये ज़मीं भी उजालों का पैरहन
विर्द-ए-ज़बाँ सभी के तराने ख़ुशी के हैं
क़िस्से सभी के लब प यहाँ रौशनी के हैं
लगता है ऐसा हर सू चिराग़ों का ये समाँ
उतरी हुई ज़मीन प हो जैसे कहकशाँ
— Zaman Zaidi ZAMAN















