“मराहिल रुख़्सती के”
ये चंचल नज़रों की अबरू
ये मुसकाता रुख़ ये गेसू
और इक बार मैं इनको देखूँ
ये गिरवीदा सी रंगीं शब
जुंबिश से लबरेज़ हुए लब
इनको अब मैं रुख़्सत कर दूँ
ज़ुल्मत में अश्कों की शिरकत
नम आँखों की फीकी रंगत
इन
में अम्न की स्याही भर दूँ
सहरा-ए-दिल में ये ख़राबा
और उस
में ये शोर-शराबा
आज इस
में ख़ामोशी कर दूँ
ज़ख़्म हरा करते ये सारे
दिल में कुछ बेचैन शरारे
इन की आग बुझा कर रख दूँ
ये बद-हाली बेबस नज़्में
बुझते शो'ले सूनी बज़्में
इक परवाने को मैं दे दूँ
रंज-ओ-ग़म में डूबी रातें
रूखी-रस्मी सी ये बातें
बिल-आख़िर ख़ून इनका कर दूँ
— kapil verma















