आईना भी दे रहा है धोखा अब
लगता है मैं हो रहा हूँ बूढ़ा अब
ख़ुद का पहले हमने सोचा ही नहीं
धीरे धीरे ही सही पर सोचा अब
ख़ूबसूरत से नज़ारे देख कर
क्यूँ थिरकना हो रहा मुश्किल सा अब
बाप को बच्चे सिखाए फ़ोन और
फ़ोन पर ही लोरी भी सुन लेता अब
ख़ैरियत है सब ये कहना पड़ता हैं
ख़ैरियत का लफ़्ज़ यानी धोखा अब
खेल एनर्जी का बताते हो धरम
दाव ये इंसानियत खा जाता अब
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