न कर सकूँगा कभी ऐसी बे-अमानी मैं

तेरे सिवा न लिखूँगा कोई कहानी मैं

बस एक बार तेरे लम्स की इनायत हो
कोई तो दाग़ हो जिस को कहूँ निशानी मैं

मेरी निगाह में है दास्ताँ निहाँ उस की
करूँ तो कैसे करूँ उस की तर्जुमानी मैं

वो मेरा नाम तो लेती नहीं मगर फिर भी
मैं बार बार उसे पूछता हूँ या'नी मैं

मुझे तू छोड़ के जाएगी जब तो मुमकिन है
कि तेरी आँख में आऊँगा बन के पानी मैं

यही तो फ़र्क है अपने ख़याल में या'नी
जदीद शा'इरी है तू ग़ज़ल पुरानी मैं

— Aadi Ratnam

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