hamaare naam ke patthar yahaañ vahaañ pe lage | हमारे नाम के पत्थर यहाँ वहाँ पे लगे

  - Khalid Azad

हमारे नाम के पत्थर यहाँ वहाँ पे लगे
जहाँ ज़रूरी थे अब तक वहाँ कहाँ पे लगे

मैं इक अचूक निशाना लगाने वाला था
चले जो तीर तो सारे ग़लत निशाँ पे लगे

हज़ार बार भी खा के फ़रेब कब सुधरा
'अजब ये दिल है कि आख़िर इसी जहाँ पे लगे

ख़ुतूत उसको जो भेजे ग़लत पते के थे
इस एक डर से कि इल्ज़ाम भी फ़ुलाँ पे लगे

चमन में अब की उदासी मेरे सबब आई
क़ुसूर सारा यहाँ तो मगर ख़िज़ाँ पे लगे

  - Khalid Azad

Terrorism Shayari

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