सारी शब बैठ तेरा हिज्र मनाया हम ने
उठते ही फ़र्ज़ी सा इक चेहरा लगाया हम ने
इश्क़ की लौ जला दी ज़ीस्त में मेरे किसी ने
फिर तो क्या उस के लिए ख़ुद को जलाया हम ने
चाहता था वो परिंदा भी रिहाई मुझ से
क़ैद से दिल की उसे फिर तो उड़ाया हम ने
मुद्दतों राह तकी यार की आँखों ने जब
आँखों के सब्र को फिर सब्र सिखाया हम ने
एक दिन लग गई ठोकर उसे पा में गहरी
बाँहों में उस को तो हल्के से उठाया हम ने
आख़िरी बार वो जब मिलने था हम से आया
फिर उसे प्यारा वो लग जा गले गाया हम ने
— Manish jain















