दिल की बेताबियाँ बड़ाने की
क्या ज़रूरत थी सज के आने की
कुछ हमें भी तबीब बतला दो
है दवा कोई ग़म भुलाने की
वो न माने मनाने पर फिर भी
हम ने छोड़ी न जिद मनाने की
उन को जा कर हुआ है अर्सा पर
आस अब भी है उन के आने की
फाखा कश हैं पडोस में लेकिन
है ख़बर किस को उस घराने की
उन को फ़ुर्सत कहाँ के देखे वो
आके हालत को इस दिवाने की
हार कैसे 'कलाम' मानें हम
हम को आदत है जीत जाने की
— Maviya abdul kalam khan















