जिस पे लफ़्ज़ों का वार होता है
उस का दिल बे-क़रार होता है
माँ का साया जहाँ नहीं होता
घर वो उजड़ा दयार होता है
छीन कर हक किसी का यूँ जीना
दिल पे अपने तो बार होता है
चोट लगती है जब भी अपनों से
ग़ैरों पर ऐतिबार होता है
हम जियें कैसे यूँ उसूलों पर
हम से हरगिज़ न यार होता है
कोई हम को कलाम बतलाऐ
जाने कैसे ये प्यार होता है
— Maviya abdul kalam khan















