रंजिशों से जुदा रास्ते हो गए
और फिर दरमियाँ फ़ासले हो गए
हम जहाँ से चले आ गए फिर वहीं
रक्स-ए हालात से दाएरे हो गए
शीरीं पैराए में जब भी की गुफ्तगू
हम तो गिरवीदा बस आप के हो गए
गांव जलता रहा वो तमाशाई थे
उन के शहरों में भी हादसे हो गए
अपने हो कर भी थे जो कभी अजनबी
हाजतों के सबब वास्ते हो गए
— Maviya abdul kalam khan















