utha ke chaltaa hooñ main apni zaat ki gardan | उठा के चलता हूँ मैं अपनी ज़ात की गर्दन

  - Amaan mirza

उठा के चलता हूँ मैं अपनी ज़ात की गर्दन
बहुत बड़ी है मेरे तजरेबात की गर्दन

फलाँ की ऊँची रहे और फलाँ की नीची रहे
न जाने किसने बनाई है ज़ात की गर्दन

यूँँ टूटता है सिकंदर के आगे सबका ग़ुरूर
के शय के आगे ही झुकती है मात की गर्दन

वो ज़िद्दी लड़की अभी तक भी मुझ सेे है नाराज़
पकड़ के बैठी है बस एक बात की गर्दन

मशक्कतों से परेशानियों से तंग आकर
दबोच दूँगा मैं इक दिन हयात की गर्दन

  - Amaan mirza

Baaten Shayari

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