निगाह जाती नहीं, कोई उसे देखा नहीं करता
वो इक नायाब शै जिस का कोई पहरा नहीं करता
ज़रूरी है कि तुझ में इंतिहाई तिश्नगी भी हो
महज़ पानी का ना होना, तुझे सहरा नहीं करता
नहीं है रोकना जायज़, सहारा अश्क का लेकर
हमें मालूम था लेकिन ये मरता क्या नहीं करता
ये कैसा घर है जिस में कोई भी अपना नहीं रहता
ये कैसा पेड़ है जो मुझ पे ही साया नहीं करता
दिलों में है अलग सबके लबों पर एक ही ग़म है
"कभी ऐसा नहीं होता अगर वैसा नहीं करता"
तुझे छूता है फिर ख़ुद हाथ अपने चूम लेता है
वो आशिक़ लम्हा छोड़ो लम्स भी ज़ाया' नहीं करता
जहाँ भर में टहलती है अधूरी बात ही केवल
मुकम्मल इश्क़ हो तो भी कोई चर्चा नहीं करता
नहीं कुछ राब्ता जिनसे "निरा" उन को भी शिकवा है
गुज़रता सामने से है मगर देखा नहीं करता
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