बताऊँ क्या कौन सी वो नस है सहूलियत है

गिरफ़्त में उस की अब नफ़स है सहूलियत है

भला ये दरिया कहाँ कभी एक जगह ठहरा
सभी रक़ीबों को दस्तरस है सहूलियत है

बचा लिया ख़ुद को ख़ुद से फिर एक बार मैं ने
न जन्मदिन में अभी बरस है सहूलियत है

वो कौन था जो हमें अँधेरे में दिख रहा था
नहीं है इंसान राक्षस है सहूलियत है

रिहाई पर भी परिंदे के ज़ेहन में वही था
यूँ चीख़ता था जहाँ क़फ़स है सहूलियत है

— Piyush Sharma

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