उस के इज़हार में तो देरी है
जाने को आई ट्रेन मेरी है
रुख़्सती हो चुकी है उस की पर
जान अब भी मगर वो मेरी है
होंठ भी चूमने थे उस के तो
जिस की काग़ज़ में यादें ढ़ेरी है
इश्क़ गर बे-वफ़ाई करता है
फिर ख़ुदाया ये चाल तेरी है
— Amanpreet singh
जाने को आई ट्रेन मेरी है
रुख़्सती हो चुकी है उस की पर
जान अब भी मगर वो मेरी है
होंठ भी चूमने थे उस के तो
जिस की काग़ज़ में यादें ढ़ेरी है
इश्क़ गर बे-वफ़ाई करता है
फिर ख़ुदाया ये चाल तेरी है
Other ghazal from the same pen
Shers of dushman.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling