अजी होती नहीं है ज़िन्दगी आसान कमरे में

मेरी तो रोज़ जाती है मुसलसल जान कमरे में

मुझे है शौक मुश्किल दौर से हर रोज़ लड़ने का
वगरना ख़ुद-कुशी के हैं सभी सामान कमरे में

इधर मौजूद है कमरे में मेरे संग तन्हाई
उधर बैठे हैं मिलने को मुझे मेहमान कमरे में

उधर वो मुस्कुरा कर ग़ैर को अपना रही थी पर
इधर रोता रहा मैं बैठ उस दौरान कमरे में

बहुत पहले थे ज़िंदा हम किसी की बाँह में यारों
मगर अब कट रही है ज़िन्दगी वीरान कमरे में

अगर है 'वीर' आज़ादी कहीं, तो बस परिंदों को
अगर पाबंद है कोई तो बस इंसान कमरे में

— Ravi 'VEER'

More by Ravi 'VEER'

Other ghazal from the same pen

See all from Ravi 'VEER' →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling