क्या हो गर गुमनाम ख़ज़ाने मिल जाएँ
या'नी फिर वो यार पुराने मिल जाएँ
जिन के साथ में गुज़रा बचपन सारा, वो
मिल जाएँ तो यार ज़माने मिल जाएँ
मंज़िल की ख़ातिर जो निकले हैं घर से
उन को मंज़िल ठौर ठिकाने मिल जाएँ
चाय के प्याले भी करते हैं याद उन्हें
कहते हैं इक बार दीवाने मिल जाएँ
— Ravi 'VEER'















