इत्तेफ़ाकन नाम तेरा सोच कर रोने लगे
सोच कर अब तू नहीं है दर-ब-दर रोने लगे
ठीक है नाराज़गी पर ये न हो जाए कहीं
ग़ैर के शाने तुम्हारा हम-सफ़र रोने लगे
आप क्यूँ है यूँ परेशाँ देख कर हम को यहाँ
हम ही पागल जो यहाँ शाम-ओ-सहर रोने लगे
इस फ़रेबी से जहाँ में ढूँढ़ लो तुम भी कोई
जो तुम्हारे आँसुओं को देख-कर रोने लगे
शाम होते ही परिंदे घर तो लौट आए मगर
आशियाना खो गया तो फूट-कर रोने लगे
सोच कर चुप हो गए हम एक घर अपना भी है
किस तरह चल पाएगा वो, हम अगर रोने लगे
मुस्कुरा कर कह रहे थे ठीक हो जाऊँगा मैं
और फिर मुँह फेरकर वे चारा-गर रोने लगे
लौट कर आए तो जाना वो यहाँ से जा चुकी
जब सुनी हम ने गली में ये ख़बर, रोने लगे
'वीर' मुश्किल है यहाँ मिलना की ऐसा शख़्स जो
तुम इधर रोने लगो तो वो उधर रोने लगे















