"क़िस्मत"
कभी सोचता हूँ मेरा हक़ है उस पर
वही जो किसी और की हो चुकी है
वो लड़की जो क़िस्मत में मेरे लिखी थी
लकीरों से मेरी कहीं खो चुकी है
कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ
मगर अब करूँ तो करूँ क्या भला मैं
निगाहों में उस का ही चेहरा बसा है
उसी को ये दिल मानता अब ख़ुदा है
ये दिल अब धड़कता ही उस के लिए है
ये पागल तड़पता ही उस के लिए है
कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ
मैं कितना अभागा हूँ कह भी न पाया
पनाहों में अपनी छिपा लो ना मुझ को
मेरी बेख़ुदी से बचा लो ना मुझ को
मुझे चैन पड़ता नहीं बिन तुम्हारे
घड़ी भर गले से लगा लो ना मुझ को
सुनो तुम से इक राज़ की बात कह दूँ
ये चाहत बनी ही हमारे लिए थी
मोहब्बत बनी ही हमारे लिए थी
नहीं मैं ये हरगिज़ नहीं मान सकता
कोई मुझ से ज़्यादा तुम्हें चाहता है
ये वो सच है जिस का तुम्हें भी पता है
मेरे जैसा कोई दिवाना नहीं है
मगर तुम को दिल ही लगाना नहीं है
कभी सोचता हूँ जो मेरी नहीं हो तो जिस की हो उस से चुरा लू मैं तुम को
कभी सोचता हूँ कि ग़ज़लों में अपनी पिरो कर ज़रा गुनगुना लूँ मैं तुम को
मगर जैसे क़िस्मत बदल सी गई है
कि जैसे हर इक शख़्स ने बस हमें दूर करने की साज़िश रची है
ग़लत हो रहा है अगर ये सही है
कभी सोचता हूँ बहुत सोचता हूँ















