"यक़ीं"
जाओ जाना है अगर तुम को अब
जाओ आज़ाद हो कुछ शर्त नहीं
ज़िन्दगी जीना सभी का हक़ है
क्यूँ जिए कोई यहाँ घुट घुट कर
साथ मरने का मुकम्मल वा'दा
वक़्त आया तो अधूरा निकला
हुस्न-ए-कश्मीर सा था रब्त अपना
अब फ़क़त वहशत-ए-कश्मीर सा है
मुझ को मायूसी तेरी भाती नहीं
मुझ को ख़ामोशी तेरी चुभती है
गर तग़ाफ़ुल है मसर्रत का सबब
तो मुबारक हो तग़ाफ़ुल ये तुम्हें
हाँ मगर याद रखो बात इतनी
तल्ख़ दुनिया है सितमगर हैं तमाम
इश्क़ इज़हार-ए-नुमाइश होगा
सादगी ढूँढ़ते रह जाओगे
ख़ैर जो भी हो संभल कर चलना
जाते जाते ये हक़ीक़त सुन लो
तुम मेरी ओर पलट कर इक दिन
लौट आओगे यक़ीं है मुझ को















